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Thursday, May 14, 2026

मेरिट, पारदर्शिता और मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं का संकट

प्रो. (डॉ.) अनिल नौसरान

नित्य संदेश, मेरठ। भारत में मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं, विशेषकर NEET UG, को लेकर बार-बार सामने आ रहे विवादों ने पारदर्शिता, निष्पक्षता और मेरिट आधारित शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। पेपर लीक, संगठित नकल गिरोह और प्रवेश प्रक्रिया में हेरफेर के आरोपों ने विद्यार्थियों, अभिभावकों और पूरे समाज का विश्वास हिला दिया है।


मैं, प्रो. (डॉ.) अनिल नौसरान, MBBS, MD, एक साधारण किसान परिवार से संबंध रखता हूँ और सामान्य वर्ग से आता हूँ। मैंने आठवीं कक्षा तक की शिक्षा अपने पैतृक स्थान नागल में प्राप्त की तथा नौवीं से बारहवीं तक की पढ़ाई गवर्नमेंट इंटर कॉलेज, सहारनपुर से की। बारहवीं उत्तीर्ण करने के बाद मैंने पूरी ईमानदारी, मेहनत और समर्पण के साथ CPMT की तैयारी की। जब मैं वर्ष 1988 में मेडिकल कॉलेज पहुँचा, तब विभिन्न पृष्ठभूमियों से आए अनेक विद्यार्थियों से मुलाकात हुई। अपनी शैक्षणिक यात्रा के दौरान मेरे मन में बार-बार एक प्रश्न उठता था कि कुछ ऐसे विद्यार्थी, जो पढ़ाई में सामान्य या कमजोर दिखाई देते थे, वे इतनी कठिन प्रतियोगी परीक्षा में चयन कैसे प्राप्त कर लेते हैं। समय के साथ मुझे यह समझ आया कि जहाँ अनेक विद्यार्थी आरक्षण व्यवस्था और अपनी मेहनत के बल पर सफलता प्राप्त करते हैं, वहीं कुछ मामलों में “बैकडोर एंट्री” और अनुचित तरीकों से प्रवेश मिलने की आशंका भी दिखाई देती थी। MBBS पूर्ण करने के बाद मैंने पुनः कठिन PG प्रवेश परीक्षा का सामना किया और मेरिट के आधार पर MD Pathology में प्रवेश प्राप्त किया। किंतु वहाँ भी मैंने देखा कि कुछ ऐसे विद्यार्थी, जिनका शैक्षणिक प्रदर्शन सामान्य था, वे अचानक उच्च रैंक प्राप्त कर प्रतिष्ठित MD/MS पाठ्यक्रमों में प्रवेश पा रहे थे।


यह समस्या नई नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि संगठित परीक्षा भ्रष्टाचार की जड़ें कई दशकों पुरानी हैं। हाल के वर्षों में स्थिति और अधिक चिंताजनक हो गई है। NEET UG 2024 विवाद ने पेपर लीक और परीक्षा अनियमितताओं के गंभीर आरोपों को उजागर किया। अब वर्ष 2026 में भी NEET UG परीक्षा पेपर लीक के आरोपों के कारण विवादों में घिर गई और परीक्षा रद्द करनी पड़ी, जिससे लाखों ईमानदार विद्यार्थियों को मानसिक पीड़ा और असुरक्षा का सामना करना पड़ा। कटु सत्य यह है कि समाज का एक प्रभावशाली वर्ग — जिसमें कुछ डॉक्टर, व्यापारी, उच्च अधिकारी और आर्थिक रूप से सक्षम लोग शामिल हैं — अपने बच्चों को MBBS में प्रवेश दिलाने के लिए “किसी भी कीमत पर” अवैध रास्तों का सहारा लेने को तैयार दिखाई देता है। परिणामस्वरूप, प्रत्येक वर्ष विभिन्न शहरों से कुछ संदिग्ध मामले सामने आते हैं, जहाँ कुछ विद्यार्थियों की शैक्षणिक पृष्ठभूमि साधारण होने के बावजूद वे अचानक अत्यंत उच्च रैंक प्राप्त कर लेते हैं। यदि भारत सरकार वास्तव में पेपर लीक माफिया और परीक्षा भ्रष्टाचार के इस संगठित सिंडिकेट को समाप्त करना चाहती है, तो कठोर और निष्पक्ष जांच आवश्यक है। पिछले पाँच वर्षों में संदिग्ध प्रवेशों की वैज्ञानिक और निष्पक्ष जांच की जानी चाहिए, जिसमें आर्थिक लेन-देन, संपर्क सूत्र, कोचिंग नेटवर्क तथा अभिभावकों और विद्यार्थियों की भूमिका की गहन पड़ताल हो। ऐसी पेशेवर जांच से इस पूरे संगठित नेटवर्क का पर्दाफाश किया जा सकता है।


यह केवल एक परीक्षा का मुद्दा नहीं है। यह सीधे भविष्य के डॉक्टरों की गुणवत्ता और आम जनता के स्वास्थ्य एवं सुरक्षा से जुड़ा हुआ विषय है। जब अयोग्य उम्मीदवार भ्रष्ट तरीकों से मेडिकल संस्थानों में प्रवेश प्राप्त करते हैं, तो अंततः उसका दुष्परिणाम पूरे समाज को भुगतना पड़ता है। भारत की चिकित्सा शिक्षा व्यवस्था मेरिट, ईमानदारी, पारदर्शिता और समान अवसर के सिद्धांतों पर आधारित होनी चाहिए। जो विद्यार्थी वर्षों तक दिन-रात कठिन परिश्रम करते हैं, उन्हें न्याय और सुरक्षा मिलनी ही चाहिए। मेरिट को ही सर्वोच्च स्थान मिलना चाहिए।


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