नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। कथाव्यास प्रो. पूनम लखनपाल ने मयूर विहार में प्रो.सुधाकराचार्य त्रिपाठी के आवास पर सामवेद की सप्तमकथा के चौथे दिन सामवेद में पवमान सोम, इन्द्र और अग्निदेव सम्बन्धी मन्त्रों की कथा कही।
ऋषिगण सोम से प्रार्थना करते हैं कि आप इन्द्र, वायु, वरुण, मरुत् और विष्णु की तृप्ति के लिए कलश में स्थिर हों। डॉ. पूनम ने त्रिपाठी जी की दशसरिच्छरदम् ग्रन्थ के अनुसार तोक पद को स्पष्ट किया। तोक का अर्थ मात्र सन्तान नहीं है। उसका अर्थ है— सम्बन्ध। हमारे मन में जो अतृप्त इच्छाएं रह जाती हैं वे ही स्वप्न बन कर, विचार बनकर आती हैं, उसका कारण तोक ही है। ऋषि इन्द्र से जीवन के हर छोटे बड़े युद्धों में सुरक्षा प्रदान करने की प्रार्थना करते हैं। आत्मा ही इन्द्र है, उसकी शक्तियाँ, उसकी विद्यायें भीतर ही निवास करती हैं। वे आत्मा के पूर्व जन्म में किये गये व्रत और कार्यों का स्मरण कराती हैं। हमारे तीर्थस्थलों के सुगम न होने का कारण यही है कि श्रम के बाद मिले फल में ही स्वाद और आनन्द होता है। श्येन पक्षी को उसके दृष्टि और गति की विशेषता के कारण यहाँ उद्धृत किया गया है। उन्होंने प्रमुख सात वैदिक छन्दों के वैशिष्ट्य को प्रस्तुत किया। दस अंगुलियों के माध्यम से पाँच ज्ञानेन्द्रियों पाँच कर्मेन्द्रियों के पारस्परिक सम्बन्ध को समझाया। समस्त देवता इन्द्र से मैत्री रखना चाहते हैं और सोम से उनको आकर्षित करते हैं। आकर्षण से गति है, गति से आनन्द है और आनन्द से तृप्ति है।

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