नित्य संदेश, मेरठ
उनवान “मैं और मेरी दिलरुबा”
शाम का वक़्त था। आसमान पर हल्की गुलाबी और सुनहरी रौशनी बिखरी हुई थी, जैसे किसी शायर ने अपनी ग़ज़ल में इश्क़ के रंग भर दिए हों। ठंडी हवा में गुलाब और रातरानी की ख़ुशबू घुली हुई थी। मैं हमेशा की तरह अपने कॉलेज के बाग़ में बैठा था। उसी जगह जहाँ हर पेड़, हर पत्ता, हर झोंका मेरी एक ही कहानी जानता था…
मेरी दिलरुबा की कहानी…
मैंने उसे पहली बार यहीं देखा था। सफ़ेद लिबास में, जैसे चाँद ज़मीन पर उतर आया हो। उसकी आँखें… अल्लाह की कसम, वो आँखें नहीं, दो गहरे समंदर थे जिनमें डूब जाना ही जैसे मेरी तक़दीर बन चुका था।
उस दिन दिल ने धीरे से कहा,,
“यही है… मेरी दुनिया।”
वो एक किताब लिए बैठी थी। चेहरे पर सुकून, मगर आँखों में एक मासूम सी चमक--जैसे कोई अपने ख़्वाबों में जी रहा हो। मैं उसे देखता रह गया… और वक़्त जैसे ठहर सा गया।
जब उसने पहली बार मेरी तरफ़ देखा… तो मेरी धड़कनों ने जैसे अपना रास्ता बदल लिया। वो मुस्कुराई… और उस एक मुस्कान ने मेरी पूरी ज़िंदगी का फ़ैसला कर दिया।
उस दिन के बाद मेरी हर शाम उसी बाग़ की हो गई… और हर शाम उसकी।
अब ये महज़ इत्तेफ़ाक़ नहीं था…
वो भी आती थी… रोज़… उसी वक़्त।
कभी किताब पढ़ती, कभी फूलों से खेलती, और कभी यूँ ही आसमान को देखती रहती--जैसे सितारों से कोई पुरानी दोस्ती हो।
आख़िरकार एक दिन हिम्मत जुटाकर मैंने उससे पूछा,,
“आप रोज़ यहाँ आती हैं?”
वो मुस्कुराई, “शायद… जैसे आप आते हैं।”
मैं चौंका, “तो आपने नोटिस किया?”
वो हल्का सा झुकी, और धीमे से बोली,,,,
“मुहब्बत में नोटिस नहीं किया जाता… महसूस किया जाता है…”
उसके लफ़्ज़… सीधा मेरे दिल में उतर गए।
धीरे-धीरे हमारी बातें शुरू हुईं… और फिर वो बातें ही हमारी दुनिया बन गईं।
हम घंटों बैठते,,
ख़्वाबों की बातें करते,,
ज़िंदगी की बातें करते,,
और कभी-कभी खामोश रहकर भी इशारों में बहुत कुछ कह जाते।
उसकी हँसी… मेरे दिन की रौशनी थी।
उसकी ख़ामोशी… मेरे दिल की ज़ुबान।
एक दिन उसने मुझसे पूछा—
“अगर मैं तुम्हारी ज़िंदगी का हिस्सा बन जाऊँ… हमेशा के लिए… तो?”
मैं मुस्कुराया, "मेरी ज़िंदगी मुकम्मल हो जाएगी।”
वो हल्का सा शर्मा गई… और पहली बार मैंने उसकी आँखों में वो एहसास देखा… जो सिर्फ़ सच्ची मुहब्बत में होता है।
अब हमारा मिलना सिर्फ़ एक आदत नहीं रहा,,,,,
वो मेरी ज़रूरत बन चुकी थी… मेरी दुनिया… मेरी हर धड़कन।
एक शाम, की बात है आसमान नारंगी रंग में रंगा हुआ था बारिश की हल्की हल्की फुहारें ज़मीन पर गिर रही थी,पूरे आलम में ठंडी हवा चल रही थी, यकायक वो मेरे क़रीब आकर बैठ गई।
उसने धीरे से कहा,,
“तुम्हें पता है… मैंने कभी सोचा नहीं था कि मुझे इतनी सच्ची मुहब्बत मिलेगी…”
मैंने बहुत ही प्यार के साथ उसका हाथ थाम लिया,,
“और मैंने कभी सोचा नहीं था कि मेरी मुहब्बत इतनी खूबसूरत होगी…”
वो मुस्कुराई… मगर इस बार उस मुस्कान में कोई दर्द नहीं था सिर्फ़ सुकून था।
उस दिन पहली बार हमने दिल की हर बात कह दी।
“मैं तुमसे मुहब्बत करती हूँ…” उसने धीमे से कहा।
मेरे लिए वो लफ़्ज़ किसी जन्नत से कम नहीं थे।
मैंने उसकी आँखों में देखते हुए जवाब दिया,,,,
“मैं तुमसे हमेशा से मुहब्बत करता था… बस तुम्हारे कहने का इंतज़ार था मुझे।”
दिन गुज़रते गए… और हमारी मुहब्बत और गहरी होती गई।
अब हम सिर्फ़ बाग़ तक सीमित नहीं रहे,,,
हमने साथ सपने देखे…
साथ चलने के वादे किए…
एक शाम की बात है…
बाग़ कुछ ज़्यादा ही सजा-संवरा लग रहा था। हल्की हवा चल रही थी, और फूलों की खुशबू जैसे हर तरफ़ इश्क़ का पैग़ाम फैला रही थी।
मैं आज कुछ अलग था…
दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था, जैसे सीने से बाहर आ जाएगा। हाथों में हल्की सी कंपकंपी थी क्योंकि आज मैंने ठान लिया था
आज मैं उसे सब कुछ बता दूँगा।
वो हमेशा की तरह आई… सफ़ेद लिबास में, आज वो आसमान की किसी परी से ज़्यादा हसीन लग रही थी। जैसे चाँद ने खुद उसे रोशनी उधार दी हो।
“आज कुछ बदले-बदले लग रहे हो…” उसने मुस्कुराकर पूछा।
मैंने गहरी साँस ली… और उसे उसी बेंच तक ले गया जहाँ हमारी पहली मुलाक़ात हुई थी।
कुछ पल खामोशी रही…
हवा चलती रही…
और दिल… बस उसका नाम लेता रहा।
फिर मैंने उसकी आँखों में देखा और कहा,,,,
“तुम्हें पता है… जब मैंने तुम्हें पहली बार देखा था, तो लगा जैसे मेरी अधूरी कहानी को उसका आख़िरी सफ़ा मिल गया हो…”
वो चुपचाप सुनती रही… उसकी आँखों में हल्की सी चमक थी।
मैंने आगे कहा,
“तुम सिर्फ़ एक लड़की नहीं हो… तुम वो एहसास हो जो हर दुआ में माँगा जाता है… वो सुकून हो जो हर दिल चाहता है… और वो मुहब्बत हो… जो सिर्फ़ एक बार होती है।”
अब उसकी साँसें भी थोड़ी तेज़ हो गई थीं…
मैं धीरे से उसके सामने घुटनों पर बैठ गया।
जेब से एक छोटी सी अंगूठी निकाली… और काँपती आवाज़ में कहा,,,,
“मैं नहीं जानता कि कल क्या होगा… मगर इतना जानता हूँ कि हर आने वाला कल तुम्हारे साथ चाहिए… क्या तुम मेरी ज़िंदगी बनोगी?”
"उसकी आँखों से आँसू बह निकले…
मगर ये आँसू दर्द के नहीं… बल्कि मुहब्बत के थे।
वो हल्का सा मुस्कुराई… और धीरे से बोली,,,
“तुमने इतना इंतज़ार क्यों करवाया…?
मैं तो कब से तुम्हारी थी…”
उसने अपना हाथ मेरे हाथ में रख दिया।
उस पल आसमान में एक अजीब सी कशमकश थी मानो…
जैसे वक़्त ठहर सा गया हो,
हवा मुस्कुरा उठी,
और बाग के हर पेड़ ने हमारी मुहब्बत को अपनी दुआओं में शामिल कर लिया।
मैंने अंगूठी उसके हाथ में पहनाई…
और वो पल हमारी ज़िंदगी का सबसे हसीन लम्हा बन गया।
उसने धीरे से कहा,,,
*“अब कभी छोड़कर नहीं जाओगे ना?”*
मैं मुस्कुराया और उसके माथे को चूमते हुए कहा,,,
“अब जुदाई का कोई सवाल ही नहीं जानां… क्योंकि अब तुम मेरी दुआ भी हो… और मेरी दुनिया भी।”
उस दिन के बाद…
हमारी मुहब्बत सिर्फ़ एक एहसास नहीं रही बल्कि वो एक वादा बन गई,,,,
हमेशा साथ रहने का वादा।
आज भी हम उसी बाग़ में जाते हैं…
मगर अब तन्हा नहीं।
वही बेंच, वही पेड़, वही हवा…
मगर अब हर चीज़ में एक नई रौशनी है।
जब मैं उसे देखता हूँ… तो दिल में एक ही बात आती है—
“मुहब्बत अगर सच्ची हो… तो मुकम्मल ज़रूर होती है…”
वो आज भी मेरी दिलरुबा है…
मगर अब सिर्फ़ एक ख़्वाब नहीं मेरी हक़ीक़त है…
मेरी हमसफ़र,
मेरी मुहब्बत,
मेरी ज़िंदगी।
और सच कहूँ तो…
अब हर शाम और भी खूबसूरत लगती है,,
क्योंकि वो मेरे साथ होती है।
मेरी दिलरुबा…
हमेशा के लिए।
लेखक - साजिद अली सतरंगी
फ़ोन - 9457530339


बहुत ही नज़ाकत और ख़ूबसूरती से लिखी गई दिलकश कहानी 👌👌 आपकी प्यारी दिलरुबा आपको बहुत बहुत मुबारक हो। 🌹 🌹
ReplyDelete