• रामचरित मानस जीवन की पाठशाला
सपना सी.पी. साहू
नित्य संदेश ब्यूरो, इंदौर। साहित्य को समर्पित वामा साहित्य मंच द्वारा चैत्र मास के उपलक्ष्य में एक गरिमामयी मासिक गोष्ठी का आयोजन हुआ। इस गोष्ठी का मुख्य विषय- सबहि नचावत राम गुसाई रखा गया। हिंदू नववर्ष और चैत्र मास की नवऊर्जा के बीच आयोजित इस कार्यक्रम का केंद्र बिंदु मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का जीवन दर्शन और उनके व्यक्तित्व की शिक्षाएं रहीं। कार्यक्रम का शुभारंभ शैला अजवे द्वारा सुमधुर सरस्वती वंदना और दिव्या मण्डलोई के भक्तिमय राम भजन के साथ हुआ। मंच की अध्यक्ष ज्योति जैन ने अपने स्वागत उद्बोधन में अतिथि व साहित्यकारों का अभिनंदन करते हुए कहा कि रामचरित मानस जीवन शिक्षा है। जैसे धीरज, धरम, मित्र अरु नारी, आपद काल परखिए चारी यह दोहा हर दौर में चरितार्थ होता है। धीरज के साथ धर्म, मित्र और नारी के प्रति कृतज्ञता रखना ही जीवन की सार्थकता है।

गोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में प्रखर वक्ता माला ठाकुर उपस्थित रहीं। उनका पुष्पगुच्छ से स्वागत सचिव स्मृति आदित्य और पुष्पा दसौंधी ने किया। माला ठाकुर ने अपनी ओजस्वी वाणी से रामचरित के विभिन्न आयामों पर प्रकाश डालते हुए श्रीराम के जीवन दर्शन को साझा किया। आज समाज में जो विचारशून्यता है, ऐसे में श्रद्धा और विश्वास के साथ ऐसा विषय चुनना उच्च मानसिकता का परिचायक है। प्रायः राम को तो सब मानते हैं, पर राम की नहीं मानते; जबकि करने वाले और कराने वाले सब राम ही हैं।
राम जी का परिवार एक आदर्श परिवार है। हमारे राष्ट्र में स्त्री सशक्तीकरण को एक मिथ्या नरेटिव का रूप दे दिया गया है, जबकि भारतीय संस्कृति में स्त्री हमेंशा सशक्त ही रही है। कई ऐसे नरेटिव स्थापित किए गए है जिन पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। हम 2047 के जिस आदर्श परिवार और भारत की कल्पना कर रहे हैं, वह रामराज्य की अवधारणा पर ही आधारित है। इसके लिए समस्त नागरिकों का यह कर्तव्य है कि हम गिलहरी की भांति छोटे-छोटे प्रयास करें, ताकि यह मात्र एक कल्पना न रहकर वास्तविक रामराज्य के रूप में स्थापित हो सके।
गोष्ठी में लेखिकाओं और कवयित्रियों ने रामचरितमानस की दो कालजयी चौपाइयों पर मंथन किया।
प्रथम चौपाई - धीरज धरम मित्र अरु नारी। आपद काल परखिए चारी।।पर विचार रखते हुए महिमा शुक्ला ने पत्नी की एकनिष्ठा को दाम्पत्य सफलता का आधार बताया, जबकि माधुरी निगम ने धैर्य धारण करने को ही जीवन की सफलता की कुंजी माना। डॉ. शोभा प्रजापति ने राम नाम को सर्वोपरि औषधि बताते हुए इसे स्वस्थ संबंधों का सूत्र कहा। अवंति श्रीवास्तव ने विपरीत परिस्थितियों में कर्तव्यपरायणता की परीक्षा को प्रमुखता से रखा। डॉ. आराधना तिवारी ने नारी आपत्तिकाल में नहीं हर काल में अपनी मित्र है। डॉ. सुनीता दुबे ने विपत्ति में साथ देने वाले को ही सच्चा मित्र बताया। अनुपमा गुप्ता ने कहा कि संकट के समय ही धैर्य, धर्म, मित्रता और नारी की असल परख होती है। श्रुति शर्मा ने भी स्वरचित पंक्तियों में कलयुगी समाज में राम के आदर्शों को अपनाने पर जोर दिया।

दूसरी चौपाई - बिनु सत्संग विवेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।। पर चर्चा करते हुए डॉ. स्नेहलता श्रीवास्तव ने इसे मानवता की रक्षा का दर्शन निरूपित किया। सपना सी.पी. साहू ने संगत को ही जीवन की गति का आधार बताया। आशा गर्ग ने सत्संग से व्यक्ति के कर्मशील होने की बात कही, तो निरुपमा त्रिवेदी ने सत्कर्म और कुसंगति से बचने को जीवन का मूल मंत्र बताया। भावना दामले ने ईश्वर में पूर्ण समर्पण को शांति का मार्ग बताया, जबकि आशा मानधन्या ने आज मानव के पास सब कुछ होकर भी जो अशांति है इसका कारण सही मार्गदर्शन सत्संग नहीं होना बताया। जयश्री उपाध्याय ने विवेक आध्यात्मिक अर्थ में शाश्वत और नश्वर संसार और हम में भेद करने वाली अलौकिक शक्ति कहा। काजल मजुमदार ने लघुकथा सुनाई, प्रेमलता मेहता ने कहा सत्संग, विवेक और रामकृपा न मिले तो जीवन में आगे बढ़ना मुमकिन नहीं है। प्रतिभा जोशी ने सत्संग को जीवन के नाम को उतारने पर साहित्यिक विचार प्रस्तुत किए।
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यह आयोजन भारतीय संस्कृति के आदर्शों और रामराज्य के मूल्यों को जन-मानस तक पहुंचाने का एक सराहनीय प्रयास रहा। कार्यक्रम का सफल संयोजन उषा गुप्ता ने किया और संचालन इंदु पाराशर द्वारा किया गया। अंत में अनिता जोशी ने आभार व्यक्त किया।
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