मेरठ। देश की शिक्षा व्यवस्था आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी
है, जहाँ एक निर्णय लाखों बच्चों के भविष्य, हजारों परिवारों की आजीविका और समाज की
बुनियादी संरचना को प्रभावित कर सकता है। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आवासीय
परिसरों में संचालित शैक्षणिक गतिविधियों को बंद करने संबंधी आदेश ने देशभर के छोटे
और मध्यम स्तर के विद्यालयों को गंभीर संकट में डाल दिया है।
वास्तविकता यह है कि भारत में लगभग 80 से 90 प्रतिशत विद्यालय ऐसे हैं, जो आवासीय क्षेत्रों में संचालित होते हैं। यही विद्यालय मध्यम वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग के बच्चों को सुलभ, किफायती और स्थानीय स्तर पर शिक्षा प्रदान करते हैं। आज जब बड़े निजी विद्यालयों की फीस ₹8,000 से ₹20,000 प्रतिमाह तक पहुँच चुकी है, तब अधिकांश परिवारों के लिए अपने बच्चों को इन विद्यालयों में भेजना संभव नहीं है। ऐसे में ये छोटे विद्यालय केवल शिक्षा का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के संतुलन का आधार हैं।
यदि इन विद्यालयों को बंद किया जाता है, तो इसके दूरगामी और विनाशकारी परिणाम होंगे—
- करोड़ों विद्यार्थियों की शिक्षा बाधित होगी
- लाखों शिक्षक और कर्मचारी बेरोजगार हो जाएंगे
- अभिभावकों के सामने बच्चों की शिक्षा का गंभीर संकट
खड़ा हो जाएगा
- देश की समग्र शिक्षा व्यवस्था असंतुलित हो जाएगी
यह भी ध्यान देने योग्य है कि इनमें से अनेक विद्यालय पिछले 30-40 वर्षों से संचालित हो रहे हैं और उन्हें समय-समय पर संबंधित विभागों द्वारा मान्यता प्रदान की गई है। उस समय मान्यता के मापदंडों में भूमि उपयोग (Land Use) को कभी प्रमुख बाधा नहीं बनाया गया। अब अचानक इस आधार पर विद्यालयों को बंद करना न केवल प्रशासनिक असंगति को दर्शाता है, बल्कि उन लाखों लोगों के साथ अन्याय भी है जिन्होंने इन संस्थानों पर भरोसा किया।
यह केवल विद्यालयों का मुद्दा नहीं है—यह देश के भविष्य का प्रश्न है।
मैं, कवल जीत सिंह, इंडिया स्कूल लीडर्स एसोसिएशन की ओर
से पहले ही माननीय सुप्रीम कोर्ट में इस विषय पर अपील कर चुका हूँ। यद्यपि कुछ आंशिक
राहत प्राप्त हुई है, परंतु यह पर्याप्त नहीं है। अब आवश्यकता है एक व्यापक जन-आवाज़
की।
मैं देश के सभी अभिभावकों, शिक्षकों, सामाजिक संगठनों
और जागरूक नागरिकों से भावपूर्ण अपील करता हूँ—
- आप भी अपने स्तर पर माननीय सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका
दायर करें
- राज्य सरकारों और केंद्र सरकार से इस विषय में तत्काल
हस्तक्षेप की मांग करें
- जनप्रतिनिधियों तक अपनी आवाज़ पहुँचाएँ
- शिक्षा को अधिकार के रूप में बचाने के इस संघर्ष में
सहभागी बनें
मानवता, व्यावहारिकता और संवेदनशीलता के आधार पर इस निर्णय पर पुनर्विचार होना चाहिए। शिक्षा कोई व्यवसाय नहीं, बल्कि समाज की नींव है—और इस नींव को कमजोर करने का परिणाम पूरे राष्ट्र को भुगतना पड़ेगा।
आइए, मिलकर अपने विद्यालयों को बचाएँ—अपने बच्चों के भविष्य को बचाएँ।

No comments:
Post a Comment