Breaking

Your Ads Here

Tuesday, April 14, 2026

डॉ. अंबेडकर जयंती पर सुभारती में संगोष्ठी: सामाजिक न्याय के विचारों से विकसित भारत की दिशा पर मंथन



नित्य संदेश ब्यूरो


मेरठ। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालयमेरठ में डॉ. भीमराव अंबेडकर की 135वीं जयंती के अवसर पर विकसित भारत के लिए समकालीन भारत में सामाजिक न्याय पर डॉ. अंबेडकर के दृष्टिकोण की प्रासंगिकता’ विषय पर एक दिवसीय संगोष्ठी का भव्य आयोजन किया गया। यह संगोष्ठी डॉ. भीमराव अंबेडकर शोधपीठ एवं जिला विधिक सेवा प्राधिकरणमेरठ के संयुक्त सहयोग से आयोजित की गईजो श्री राजेश चंद्र (पूर्व न्यायमूर्तिइलाहाबाद उच्च न्यायालयप्रयागराजउत्तर प्रदेश) के मार्गदर्शन तथा सुभारती विधि महाविद्यालय की डीन प्रो. (डॉ.) रीना बिश्नोई के संरक्षण में संपन्न हुई।



संगोष्ठी की मुख्य वक्ता अतिरिक्त सिविल जज एवं जिला विधिक सेवा प्राधिकरण मेरठ की सचिव नम्रता सिंह ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए संविधान की मूल भावना पर गहन चिंतन करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि हमें यह समझना होगा कि किन परिस्थितियों में बाबा साहेब डॉ. अंबेडकर ने संविधान निर्माण का संकल्प लिया। उन्होंने विद्यार्थियों से अपील की कि वे संविधान की उद्देशिका का अक्षरशः पालन करें और अपने कर्तव्यों के प्रति ईमानदार रहें। ्रकुलपति प्रो. (डॉ.) प्रमोद कुमार शर्मा ने अपने उद्बोधन में कहा कि समाज में सभी को समान मानते हुए मानवता को सर्वोपरि रखना ही सच्ची प्रगति का मार्ग है। उन्होंने विद्यार्थियों को प्रेरित किया कि वे अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहें और बाबा साहेब के सिद्धांतों को जीवन में आत्मसात करें।


वहीं प्रो. (डॉ.) सी. मुनीष रेड्डीप्रो-वाइस चांसलर ने हम भारतीय हैं और हमेशा भारतीय रहेंगे’ के उद्घोष के साथ अपने विचार रखे। डीन अनुसंधान एवं अन्वेषण विभाग प्रो. (डॉ.) वैभव गोयल ने अपने विचार रखते हुए कहा कि डॉ. अंबेडकर का दर्शन सामाजिक न्याय पर आधारित थाजो किसी भी विकसित समाज की आधारशिला है। उन्होंने सतत विकास लक्ष्यों के संदर्भ में सामाजिक न्याय की प्रासंगिकता को रेखांकित करते हुए बताया कि भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने में शोधअनुसंधान और भारतीय ज्ञान परंपरा की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 14 की व्याख्या करते हुए समानता के सिद्धांत को समझने पर बल दिया।


पूर्व न्यायमूर्ति राजेश चंद्र ने अपने उद्बोधन में सामाजिक विषमताओं और छुआछूत जैसी कुरीतियों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि बाबा साहेब का सपना एक ऐसे भारत का थाजहां समानतास्वतंत्रता और बंधुत्व की भावना के साथ सभी को न्याय प्राप्त हो। उन्होंने कहा कि विकसित भारत की ओर बढ़ते हुए हमें इन मूल्यों को आत्मसात करना होगा। प्रो. (डॉ.) टी.एन. प्रसादविभागाध्यक्षफैकल्टी ऑफ लिबरल आर्ट्स एंड सोशल साइंसेज ने संविधान की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा कि यह प्रत्येक कानून की गुणवत्ता का परीक्षण करने वाली कसौटी है।


डॉ. अंबेडकर चेयर के प्रो. (डॉ.) अनोज राज ने शोधपीठ की उपलब्धियों की जानकारी देते हुए बताया कि इसकी स्थापना वर्ष 2020 में की गई थी और अब तक कई शोध कार्य एवं प्रकाशन संपन्न हो चुके हैं। उन्होंने यह भी बताया कि शोधार्थियों को विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा विशेष छात्रवृत्ति प्रदान की जा रही है।


कार्यक्रम की शुरुआत में अतिथियों का स्वागत करते हुए प्रो. (डॉ.) रीना बिश्नोई ने संगोष्ठी की रूपरेखा प्रस्तुत की और वर्तमान समय में डॉ. अंबेडकर के विचारों की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि राजनीतिक लोकतंत्र के साथ-साथ सामाजिक एवं आर्थिक लोकतंत्र भी उतना ही आवश्यक हैतभी समतामूलक समाज की स्थापना संभव है। कार्यक्रम का सफल संचालन सोनल जैन द्वारा किया गयाजबकि अंत में प्रो. (डॉ.) प्रेमचंद ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए सभी अतिथियोंप्रतिभागियों एवं आयोजकों के प्रति आभार व्यक्त किया।


इस संगोष्ठी में डॉ. सारिका त्यागीडॉ. आफरीन अलमासशालिनी गोयलअरशद आलमअनुराग चौधरीहर्षितआशुतोष देशवालशिवानीमुस्कान श्रीवास्तवपार्थ मल्होत्रा सहित विभिन्न संकायों के शिक्षकगणबड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं एवं गैर-शैक्षणिक कर्मचारी उपस्थित रहे।  यह संगोष्ठी न केवल डॉ. अंबेडकर को सच्ची श्रद्धांजलि देने का माध्यम बनीबल्कि विद्यार्थियों को सामाजिक न्यायसमानता और संवैधानिक मूल्यों के प्रति जागरूक करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल भी सिद्ध हुई।


No comments:

Post a Comment

Your Ads Here

Your Ads Here