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Thursday, February 5, 2026

TET अनिवार्यता के खिलाफ और शिक्षकों की अन्य मांगों को लेकर देशभर के टीचर्स का दिल्ली में हल्ला


इकराम चौधरी
नित्य संदेश, नई दिल्ली। शिक्षकों की विभिन्न ज्वलंत समस्याओं और मांगों को लेकर बुधवार को देशभर से आए शिक्षकों ने राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर जोरदार प्रदर्शन किया। यह प्रदर्शन AIJACTO के आह्वान पर आयोजित किया गया, जिसमें ऑल इंडिया आइडियल टीचर्स एसोसिएशन (AIITA) ने अपना पूर्ण समर्थन दिया।

प्रदर्शन में शामिल शिक्षकों ने सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते हुए शिक्षक हितों की अनदेखी का आरोप लगाया और अपनी लंबित मांगों को शीघ्र पूरा करने की मांग की। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि शिक्षक समाज की नींव होते हैं, लेकिन आज वही शिक्षक सबसे अधिक उपेक्षित है।
इस अवसर पर AIITA के मेरठ जिला अध्यक्ष रिजवान अहमद ने मंच से दिए गए अपने ज़ोरदार भाषण में कहा कि “मज़बूत शिक्षक ही मज़बूत क़ौम की बुनियाद रखता है। जब तक शिक्षक को सम्मान, सुरक्षा और स्थिरता नहीं मिलेगी, तब तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की कल्पना अधूरी रहेगी।”

उन्होंने सरकार से मांग की कि सरकारी शिक्षकों से गैर-शैक्षणिक कार्य करवाना तुरंत बंद किया जाए, ताकि शिक्षक पूरी निष्ठा से शिक्षण कार्य कर सकें। उन्होंने आगे कहा कि भारत की इसी धरती पर चाणक्य जैसे महान शिक्षक पैदा हुए हैं जिन्होंने तानाशाहों की तानाशाही को जड़ से उखाड़ फेंकी थी ये शिक्षक भी उन्हीं के वंशज है और यदि सरकार ने उनकी मांगे न मानी तो फिर इसके परिणाम मौजूदा सरकार को भी भुगतने होंगे ।

वहीं AIITA के केंद्रीय सचिव ख़ालिद इक़बाल ने कहा कि “आज शिक्षकों से पढ़ाई के अलावा चुनाव, सर्वे, जनगणना और अन्य गैर-ज़रूरी काम करवाए जाते हैं, जिससे शिक्षा व्यवस्था प्रभावित हो रही है। यह सब तत्काल रोका जाना चाहिए।” उन्होंने RTE एक्ट से पहले नियुक्त इन-सर्विस शिक्षकों को TET की अनिवार्यता से मुक्त करने, ओल्ड पेंशन स्कीम (OPS) की बहाली, तथा स्कूलों के विलय और बंदी पर रोक लगाने की मांग की।

AIITA के SAC सदस्य सज्जादुल्ला त्यागी ने कहा कि देशभर में शिक्षकों के हजारों पद रिक्त पड़े हैं, लेकिन सरकार उन्हें भरने के बजाय स्कूलों को मर्ज करने की नीति अपना रही है, जो शिक्षा और विद्यार्थियों दोनों के हित में नहीं है। उन्होंने सभी रिक्त पदों को तुरंत भरने की मांग की। प्रदर्शन के दौरान शिक्षकों ने यह भी मांग उठाई कि उन्हें केवल शिक्षण कार्य तक सीमित रखा जाए और प्रशासनिक व गैर-शैक्षणिक जिम्मेदारियों से मुक्त किया जाए। शिक्षकों ने चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा। मौहम्मद सलीम मिज़ाज व मौहम्मद खालिद ने भी इस विषय पर अपनी बात रखी।

अंत में सभी संगठनों ने एक स्वर में कहा कि यह आंदोलन किसी एक संगठन या राज्य का नहीं, बल्कि पूरे देश के शिक्षकों के सम्मान, अधिकार और भविष्य से जुड़ा हुआ है।

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