प्रो.(डॉ.) अनिल नौसरान
नित्य संदेश, मेरठ। हाल ही में उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में एक अत्यंत दुखद घटना सामने आई, जिसमें तीन सगी बहनों ने अपने अपार्टमेंट की नौवीं मंज़िल से छलांग लगा दी। प्रारंभिक रिपोर्ट्स के अनुसार, यह घटना एक कोरियन ऑनलाइन “लव गेम” के प्रभाव में हुई बताई जा रही है। यह हादसा केवल तकनीक की गलत दिशा का परिणाम नहीं है, बल्कि यह माता-पिता की बढ़ती अनदेखी और परिवारों में भावनात्मक दूरी की एक दर्दनाक चेतावनी है।
आज के डिजिटल युग में बच्चे आभासी दुनिया में अधिक समय बिता रहे हैं, जबकि वास्तविक जीवन में पारिवारिक संबंध कमजोर होते जा रहे हैं। अनेक माता-पिता इस बात से अनजान रहते हैं कि उनके बच्चे क्या देख रहे हैं, क्या खेल रहे हैं और मानसिक रूप से क्या महसूस कर रहे हैं। मोबाइल फोन ने बातचीत, बाहर खेलने, पारिवारिक समय और भावनात्मक सहारे की जगह ले ली है।
समस्या केवल बच्चों में नहीं है। माता-पिता स्वयं भी सोशल मीडिया में व्यस्त रहते हैं—दूसरों को सुप्रभात संदेश भेजते हैं, लेकिन अपने बच्चों से सुबह बात तक नहीं करते; रील्स देखते हैं, पर अपने बच्चे के व्यवहार, भावनाओं और मानसिक स्थिति पर ध्यान नहीं देते।
ऐसी घटनाओं के प्रमुख कारण
1. माता-पिता की निगरानी की कमी
2. मोबाइल फोन का अत्यधिक और अनियंत्रित उपयोग
3. शारीरिक गतिविधियों का अभाव
4. पारिवारिक संवाद और सामाजिक मेलजोल की कमी
5. एक ही घर में रहते हुए भी भावनात्मक अकेलापन
आज बच्चों के पास भौतिक सुविधाएँ तो हैं, लेकिन भावनात्मक सुरक्षा नहीं।
माता-पिता को यह समझना होगा कि मोबाइल छीन लेना या जबरदस्ती नियम थोपना समाधान नहीं है। समाधान है — विश्वास, संवाद और साथ।
कुछ आवश्यक कदम:
* बच्चों की दैनिक गतिविधियों पर ध्यान दें।
* मोबाइल और स्क्रीन टाइम की सीमा तय करें।
* प्रतिदिन परिवार के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताएँ।
* बच्चों के मित्र बनें, केवल अनुशासक नहीं।
* उनके साथ खेलें, अंदर और बाहर दोनों।
* परिवार के साथ भोजन करें।
* उनके कमरे में जाकर देखें कि वे अकेले कितना समय बिताते हैं।
* उनके कपड़ों, मित्रों और व्यवहार पर ध्यान दें।
* जल्दी सोने और जल्दी उठने की आदत डालें।
* मौसमी फल और स्वस्थ आहार दें।
* मोबाइल के स्थान पर खेल, संगीत, पठन-पाठन और रचनात्मक गतिविधियाँ दें।
सबसे महत्वपूर्ण — उनके चेहरे पढ़ें। चेहरे के भाव चिंता, अवसाद, डर और मानसिक पीड़ा को शब्दों से पहले ही प्रकट कर देते हैं।
आज अनेक बच्चे तनाव, प्रतिस्पर्धा, ऑनलाइन प्रभाव और भावनात्मक उपेक्षा से चुपचाप जूझ रहे हैं। वे बोलते नहीं, लेकिन उनके व्यवहार, नींद, चिड़चिड़ापन और अकेलापन स्पष्ट संकेत देते हैं।
माता-पिता को याद रखना चाहिए:
नियंत्रण नहीं, देखभाल जरूरी है।
जासूसी नहीं, सुरक्षा जरूरी है।
अंतिम संदेश
गाजियाबाद की यह घटना केवल एक खबर बनकर न रह जाए, बल्कि यह पूरे समाज के लिए चेतावनी बने।
यदि माता-पिता स्क्रीन में व्यस्त रहेंगे और बच्चे भावनात्मक युद्ध अकेले लड़ेंगे, तो ऐसी त्रासदियाँ बढ़ती जाएँगी।
अब समय है वापस लाने का:
* पारिवारिक खेल
* पारिवारिक भोजन
* पारिवारिक संवाद
* पारिवारिक जुड़ाव
क्योंकि कोई भी ऑनलाइन गेम, कोई भी सोशल मीडिया और कोई भी डिजिटल दुनिया बच्चे के जीवन से अधिक महत्वपूर्ण नहीं है।
सचेत रहें। जुड़े रहें। उपस्थित रहें।
अपने बच्चों को बचाइए — कल नहीं, आज।
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