नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। बजट के समक्ष भू-राजनीतिक तनाव, वैश्विक वित्तीय अस्थिरता और व्यापार विभाजन जैसी नई चुनौतियाँ के बीच आज 1 फरवरी को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा प्रस्तुत कुल 53.5 लाख करोड़ रुपए का यह बजट न सिर्फ सरकार की आर्थिक नीति में निरंतरता को दर्शाता है बल्कि प्राथमिकताओं में गुणात्मक परिवर्तन भी दिखाता है । जहाँ बजट 2025–26 का मुख्य उद्देश्य महामारी पश्चात आर्थिक स्थिरता और निवेश को गति देना था, वहीं बजट 2026–27 विकास की निरंतरता, राजकोषीय अनुशासन और दीर्घकालिक संरचनात्मक सुधारों पर अधिक केंद्रित दिखाई देता है । हालाकि यह बजट जनमानस हेतु लोक लुभावना तो नहीं परन्तु निरंतरता और प्राथमिकताओं के आधार पर आर्थिक प्रबंधन का एक कुशल दस्तावेज है ।
राजकोषीय समेकन-
बजट में गैर-ऋण प्राप्तियां और कुल व्यय क्रमशः ₹36.5 लाख करोड़ और ₹53.5 लाख करोड़ अनुमानित हैं । केंद्र की शुद्ध कर प्राप्तियां ₹28.7 लाख करोड़ अनुमानित हैं। आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 के अनुसार भारत की वास्तविक GDP वृद्धि दर लगभग 7.4 प्रतिशत रही, जबकि आर्थिक सर्वेक्षण 2024–25 में यह अनुमान लगभग 7.2 प्रतिशत था। महँगाई दर में भी उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई । वित्त वर्ष 2024–25 में औसत मुद्रास्फीति लगभग 5.4 प्रतिशत थी, जो 2025–26 में घटकर लगभग 2 प्रतिशत के आसपास आ गई । यह दर्शाता है कि मौद्रिक और राजकोषीय नीतियों का समन्वय अपेक्षाकृत सफल रहा है और इसी आधार पर नया बजट प्रस्तुत किया गया है । बजट 2025–26 में राजकोषीय घाटा 4.4 प्रतिशत निर्धारित किया गया था। वर्तमान बजट 2026–27 में इसे घटाकर 4.3 प्रतिशत किया गया है । यह संकेत करता है कि सरकार विकास व्यय को बनाए रखते हुए राजकोषीय समेकन (Fiscal Consolidation) की दिशा में आगे बढ़ रही है । आर्थिक सर्वेक्षण ने भी सार्वजनिक ऋण-GDP अनुपात में गिरावट को सकारात्मक संकेत माना था । वर्ष 2026-27 में केंद्र सरकार का ऋण-से-जीडीपी अनुपात 55.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है । यह 2025-26 के संशोधित अनुमानों में जीडीपी के 56.1 प्रतिशत से गिरावट को दर्शाता है । जबकि दीर्घकालिक लक्ष्य: सरकार का लक्ष्य वित्त वर्ष 2030-31 तक ऋण-से-जीडीपी अनुपात को 50±1 प्रतिशत तक पहुंचाना है।
पूंजीगत व्यय-
बजट 2025–26 में पूंजीगत व्यय के लिए ₹11.11 लाख करोड़ का प्रावधान किया गया था हलाकि वास्तिविक व्यय लगभग 60 हजार कम रहा , वर्तमान बजट 2026–27 में इसे बढ़ाकर ₹ 12.2 लाख करोड़ किया गया है। यह वृद्धि रक्षा ,सड़क, रेलवे, बंदरगाह, ऊर्जा, डिजिटल अधोसंरचना क्षेत्र में निवेश को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से की गई है। आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार वर्ष 2018 के बाद से सार्वजनिक पूंजीगत व्यय चार गुना से अधिक बढ़ चुका है, जिससे निजी निवेश को भी बल मिला है ।
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम-
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को मजबूत करने के लिए 10,000 करोड़ रुपये के एसएमई विकास कोष का प्रस्ताव रखा और आत्मनिर्भर भारत फंड में 2,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि का भी प्रावधान किया गया है । यह कोष एमएसएमई को अपने कारोबार को बढ़ाने, उत्पादकता मानदंडों को पूरा करने, संचालन को औपचारिक रूप देने और नए बाजारों में विस्तार करने में मदद करेगा । जबकि बजट 2025–26 में एमएसएमई क्षेत्र के लिए लगभग ₹22,138 करोड़ का प्रावधान किया गया था । आर्थिक सर्वेक्षण ने भी एमएसएमई को रोजगार सृजन की रीढ़ बताया है ।
शिक्षा एवं स्वास्थ्य -
इस बजट में शिक्षा के लिए 1.39 लाख करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है जबकि गत वर्ष यह धनराशी ₹1.48 लाख करोड़ थी । उच्च शिक्षा संस्थानों में, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित (एसटीईएम) के क्षेत्र में लंबे समय तक अध्ययन और प्रयोगशाला कार्य करने से छात्राओं को कुछ चुनौतियों का सामना करना पड़ता है । सामुदायिक निधि/पूंजीगत सहायता के माध्यम से, प्रत्येक जिले में एक बालिका छात्रावास स्थापित किये जाने का भी प्रावधान किया गया है । इस केंद्रीय बजट में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय को ₹99,858.56 करोड़ आवंटित किए गए, जो पिछले वर्ष में वित्त वर्ष में आवंटित ₹90,958 करोड़ की तुलना में 9.78% की वृद्धि दर्शाता है। 2025-26 के लिए स्वास्थ्य क्षेत्र का आवंटन कुल बजट का 1.97% है, जो वित्त वर्ष 2025 के 1.9% से मामूली वृद्धि है। यह मानव पूंजी निर्माण और सामाजिक विकास को प्राथमिकता देने की नीति को दर्शाता है । स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच और उन्हें वहनीय बनाने के लिए महत्वपूर्ण उपायों की घोषणा की है। नई पहलों में NIMHANS 2.0 के साथ मानसिक स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे का विस्तार और आघात देखभाल को बेहतर बनाना शामिल है । बजट में कैंसर की दवाओं पर राहत और दुर्लभ बीमारियों के लिए सहायता का भी प्रावधान है ।
बैंकिंग एवं परिवहन -
सरकार "विकसित भारत के लिए बैंकिंग पर उच्च स्तरीय समिति" का गठन करेगी, जो इस क्षेत्र की व्यापक समीक्षा करेगी और वित्तीय स्थिरता, समावेशन और उपभोक्ता संरक्षण सुनिश्चित करते हुए इसे भारत के विकास के अगले चरण के अनुरूप बनाएगी । सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की गैर-वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) में व्यापक विस्तार और दक्षता में सुधार लाने के लिए विद्युत वित्त निगम और ग्रामीण विद्युतीकरण निगम का पुनर्गठन करेगी ।
इसके अतिरिक्त ऊर्जा, आईटी एवं दूरसंचार तथा उद्योग पर किया गया व्यय भारत को डिजिटल और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ाने का प्रयास दर्शाता है, हालांकि पूर्वोत्तर विकास, विदेश मंत्रालय और वित्त जैसे क्षेत्रों में अपेक्षाकृत कम आवंटन यह संकेत करता है कि क्षेत्रीय संतुलन और कूटनीतिक विस्तार पर भविष्य में और अधिक ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है।
नवीनतम आर्थिक सर्वेक्षण ने भी चेतावनी दी है कि वैश्विक व्यापार में बढ़ता संरक्षणवाद भारत के निर्यात को प्रभावित कर सकता है। यदि बजट 2026–27 की तुलना बजट 2025–26 से की जाए, तो स्पष्ट होता है कि सरकार की आर्थिक नीति में निरंतरता बनी हुई है, किंतु प्राथमिकताओं में विस्तार और परिपक्वता दिखाई देती है । जहाँ पिछला बजट आर्थिक स्थिरता और निवेश पुनरुद्धार पर केंद्रित था, वहीं वर्तमान बजट विकास की गति बनाए रखने और दीर्घकालिक संरचनात्मक सुधारों को सुदृढ़ करने की दिशा में एक कदम आगे बढ़ता है। यह बजट न केवल चालू वित्तीय वर्ष की आवश्यकताओं को संबोधित करता है, बल्कि भारत की दीर्घकालिक आर्थिक दृष्टि को भी दिशा प्रदान करता है ।
प्रो दिनेश कुमार ,आचार्य अर्थशास्त्र विभाग
(भूतपूर्व सचिव . भारतीय आर्थिक परिषद् )
चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय , मेरठ
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