डा. अभिषेक डबास
नित्य संदेश, मेरठ। विधि एवं संवैधानिक अध्ययन विद्यालय (एसएलसीएस) ने 17 जनवरी 2026 को "कानूनी इतिहास और भारतीय लोकतंत्र" विषय पर एक ज्ञानवर्धक व्याख्यान का आयोजन किया। भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय का प्रतिनिधित्व करते हुए श्री सुभेंदु भट्टाचार्य ने मुख्य व्याख्यान दिया, जिसमें उन्होंने भारत की कानूनी प्रणाली के ऐतिहासिक विकास और लोकतांत्रिक शासन पर इसके गहन प्रभाव का व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत किया।
अपने संबोधन में श्री भट्टाचार्य ने प्राचीन न्यायशास्त्रीय परंपराओं और औपनिवेशिक कानूनी ढाँचों से लेकर भारत के संविधान की परिवर्तनकारी भूमिका तक भारतीय विधिक इतिहास की जड़ों का पता लगाया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारतीय लोकतंत्र संवैधानिकवाद, विधि के शासन, न्यायिक स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों के संरक्षण में गहराई से निहित है। संविधान से संबंधित महत्वपूर्ण विकासों और न्यायिक हस्तक्षेपों पर प्रकाश डालते हुए, उन्होंने समझाया कि किस प्रकार विधिक इतिहास ने लोकतांत्रिक संस्थाओं को आकार दिया है, सामाजिक न्याय सुनिश्चित किया है और भारत में सहभागी शासन को मजबूत किया है।
कार्यक्रम का शुभारंभ एसएलसीएस के निदेशक प्रोफेसर पी. के. गोयल के स्वागत भाषण से हुआ, जिन्होंने भारतीय लोकतंत्र की लचीलता और अनुकूलन क्षमता को समझने के लिए कानूनी इतिहास को समझने के महत्व पर बल दिया। कार्यक्रम की समन्वयक इकरा रशीद ने कुशलतापूर्वक कार्यक्रम का संचालन किया और अकादमिक भागीदारी सुनिश्चित की।
व्याख्यान का समापन एसएलसीएस के समन्वयक डॉ. मोहम्मद आमिर के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ, जिन्होंने विशिष्ट वक्ता और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। यह कार्यक्रम छात्रों और शिक्षकों दोनों के लिए बौद्धिक रूप से ज्ञानवर्धक सिद्ध हुआ और भारत में विधि इतिहास और लोकतांत्रिक मूल्यों के बीच महत्वपूर्ण संबंध को सुदृढ़ करता है।
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