चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में “प्रगतिवादी आंदोलन : एक चर्चा” विषय पर ऑनलाइन संगोष्ठी आयोजित
नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। 1932 में “अंगारे” के छपने के बाद प्रगतिवादी आंदोलन शुरू हुआ। इस आंदोलन की जान सज्जाद ज़हीर और उनके साथी थे। 1936 की सभा में प्रेमचंद भी शामिल हुए थे। आज अगर आप डिजिटल ज़माने में लिख रहे हैं और किसी मकसद से लिख रहे हैं, तो आपको प्रगतिवादी माना जाएगा। ये शब्द थे आमिर मेहदी [इंग्लैंड] के, जो आयुसा और उर्दू विभाग की तरफ से आयोजित “प्रगतिवादी आंदोलन : एक चर्चा” टॉपिक पर अपना वक्तव्य दे रहे थे।
इस दौरान अलग-अलग सवालों के जवाब में उन्होंने कहा कि अगर आप किसी मकसद से और समाज की भलाई के लिए कुछ लिख रहे हैं, तो आपको प्रगतिशील माना जाएगा। यह आंदोलन कम्युनिज्म से जुड़ा है, यह सच है। जब तक यह दुनिया रहेगी, प्रोग्रेसिविज्म रहेगा। मैं आधुनिकता में यकीन नहीं करता क्योंकि वह टिकने वाली नहीं है, लेकिन प्रगतिवादी आंदोलन एक ऐसा मूवमेंट है जो हमेशा चलेगा। प्रगतिवादी आंदोलन का मकसद था कि कोई किसी का गुलाम न रहे और किसी के साथ नाइंसाफी न हो। दूसरे समाज और साहित्य पर किसी दूसरे आंदोलनका उतना असर नहीं होता जितना प्रोग्रेसिव मूवमेंट का होता है। जो चीजें प्रोग्रेस के लिए लिखी जाती हैं, वे रहेंगी, लेकिन जो प्रोग्रेसिविज्म से जुड़ी नहीं हैं, वे गायब हो जाएंगी। हमारे कामों में खूबसूरती नहीं है अगर हम अपने मकसद को ध्यान में रखकर काम नहीं कर रहे हैं, तो हम प्रोग्रेसिव नहीं हो सकते, लेकिन जो लोग समय की जरूरतों के हिसाब से काम कर रहे हैं और तरक्की कर रहे हैं, जरूरतों को पूरा कर रहे हैं, तो हम प्रोग्रेसिव में से होंगे। अगर आप किसी मकसद से लिटरेचर लिख रहे हैं और प्रोग्रेसिव सोच से समाज की भलाई के लिए काम कर रहे हैं, तो आपकी लिखाई एक क्रांतिकारी मूवमेंट ला सकती है। प्रेमचंद और मंटो भी प्रोग्रेसिव हैं। क्योंकि उन्होंने जरूरतों के हिसाब से लिखा। इस दौरान उन्होंने अपने नॉवेल “टेररिस्ट” पर भी डिटेल में बात की।
इससे पहले, मुहम्मद नदीम ने पवित्र कुरान की तिलावत से प्रोग्राम की शुरुआत की। प्रोफेसर सगीर अफराहीम अध्यक्ष ने मशहूर शायर आमिर मेहदी [इंग्लैंड] खास मेहमान के तौर पर शामिल हुए। लखनऊ से आयुसा की अध्यक्षा प्रोफेसर रेशमा परवीन मौजूद रहीं। प्रोग्राम का संचालन डॉ. इरशाद स्यानवी ने किया।
प्रोग्राम में बोलते हुए प्रोफेसर असलम जमशेदपुरी ने कहा कि तरक्कीपसंद आंदोलन अपने आप में एक क्रांति था। यह मूवमेंट एक ऐसा ऑर्गनाइज़ेशन था जो लोगों को आगे बढ़ाने का काम करता था। 1936 में शुरू हुए इस मूवमेंट ने उर्दू में एक क्रांतिकारी कदम उठाया और प्रेमचंद जैसे राइटर इस मूवमेंट से जुड़े थे। इस आंदोलन ने नॉवेल, कहानी, कविता वगैरह पर अपनी छाप छोड़ी।
प्रोफेसर सगीर अफराहिम ने कहा कि यह सच है कि प्रोग्रेसिव मूवमेंट एक बड़ा आंदोलन था जिसने अदब में खास रोल निभाया। लेकिन दूसरे आंदोलनों ने भी लिटरेचर में अहम रोल निभाया है और जो लिटरेचर लिखा जाएगा उसमें भी प्रोग्रेसिविज्म का असर दिखेगा। मैं आज के प्रोग्राम से इसलिए भी खुश हूं क्योंकि आज हमें प्रोग्रेसिव मूवमेंट से जुड़ी कई नई बातें सुनने को मिलीं। आज का प्रोग्राम हमारे स्कॉलर्स के लिए एक यादगार प्रोग्राम रहेगा।
इस मौके पर प्रोफेसर रेशमा परवीन, डॉ. शादाब अलीम, डॉ. इरशाद सियानवी, उलेमा नसीब, सैयदा मरियम इलाही, उज़मा मेहदी वगैरह ने प्रोग्रेसिव मूवमेंट से जुड़े कई सवाल पूछे, जिनके आमिर मेहदी ने डिटेल में जवाब दिए। प्रोग्राम से डॉ. आसिफ अली, डॉ. शादाब अलीम, डॉ. अलका वशिष्ठ, मुहम्मद शमशाद, मुहम्मद ईसा राणा, मुहम्मद जुबैर और स्टूडेंट्स जुड़े थे।
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