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Thursday, January 1, 2026

राम मंदिर से अर्थव्यवस्था का उदय


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नित्य संदेश। आंग्ल नववर्ष को मनाने का हम भारतीयों का अलग अंदाज है। हम इष्टदेव के दर्शन करके हर त्योहार और तिथि को उत्साह से मनाते हैं। शीतकालीन अवकाश होने से देश के सभी मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती है, लेकिन अयोध्या में बीते दो वर्षों में रामलला के भव्य मंदिर निर्माण ने सांस्कृतिक पुनर्जागरण का वैश्विक प्रतिमान स्थापित किया है। हमारी भारतीय वास्तुकला और आध्यात्मिकता के केंद्र मंदिर, सदियों से केवल उपासना स्थल नहीं बल्कि देश की सामाजिक और आर्थिक प्रगति के पहिए भी रहे हैं। वर्तमान समय में अयोध्या ने जो इतिहास रचा है, वह इस बात का जीवंत प्रमाण है कि धर्म और अर्थ एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। इस वर्ष अयोध्या में 22 करोड़ श्रद्धालुओं का आगमन केवल एक संख्या नहीं, बल्कि एक सभ्यता के आत्मविश्वास की गूंज है।
वर्ष 2026 के आगमन के साथ पूरे भारत में एक नई चेतना देखी गई। आंग्ल नववर्ष के शुभारंभ पर जिस प्रकार जनमानस ने पाश्चात्य चकाचौंध के बजाय मंदिरों की शांति और दिव्यता को चुना, वह बदलती भारतीय मानसिकता का परिचायक है। विशेषकर अयोध्या में श्री रामलला मंदिर की द्वितीय स्थापना वर्षगांठ पर उमड़ा श्रद्धालुओं का महासागर यह बताता है कि आधुनिक भारत अपनी जड़ों की ओर लौट रहा है। यह सांस्कृतिक गौरव और आर्थिक सुदृढ़ता का संगम है।
मंदिरों का निर्माण इतिहास में हमेशा से समृद्धि का सूचक रहा है। जब कुछ आलोचक प्रश्न करते हैं कि मंदिर बनाने से क्या होगा, तब उनके प्रश्नों के उत्तर में अयोध्या का आर्थिक प्रारूप यानी इकोनॉमिक मॉडल सामने आता है। पर्यटन विशेषज्ञों के अनुसार, आध्यात्मिक पर्यटन भारत के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने जा रहा है। अयोध्या में ही श्रद्धालुओं की संख्या में हुई वृद्धि स्थानीय अर्थव्यवस्था में अरबों रुपये का संचार कर रही है।
जब मंदिर निर्माण होता है तो कई लोगों को रोजगार के बहुआयामी अवसर मिलते हैं। प्रत्यक्ष रूप से जहां पुजारी, सेवादार और प्रबंधन से जुड़े लोग कार्यरत होते हैं, वहीं अप्रत्यक्ष रूप से यह क्षेत्र परिवहन, गाइड, फूल, पूजन सामग्री, प्रसाद की दुकानों, आतिथ्य गृह, होम स्टे, होटल, भोजनालय और खुदरा व्यापार में अकल्पनीय गति लाता है। अयोध्या में आज छोटे से छोटे ई-रिक्शा चालक से लेकर बड़े होटल व्यवसायियों तक की आय में कई गुना वृद्धि हुई है। हस्तशिल्प, स्थानीय कला और पारंपरिक भोजन को एक वैश्विक मंच मिला है। इसके अतिरिक्त ज्योतिष सामग्री, कटलरी, उपहार की दुकानें, स्थान विशेष के हथकरघा वस्त्र, खिलौने और अन्य छोटे व्यवसायियों के लिए नए आमदनी के द्वार खुल रहे हैं। इसने लोकल फॉर वोकल के सपने को धरातल पर उतारा है।
किसी भी क्षेत्र की प्रगति का पैमाना वहां का बुनियादी ढांचा होता है। अयोध्या के विकास ने तो पूरे उत्तर प्रदेश के बुनियादी ढांचे को ही बदल दिया है। अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, अत्याधुनिक रेलवे स्टेशन, चौड़ी होती सड़कें और उनसे मिलने वाला कर राजस्व केवल पर्यटकों की सुविधाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये निवेश के नए द्वार खोलते हैं। जब संबद्धता बेहतर होती है, तो उद्योग और व्यापार स्वतः खिंचे चले आते हैं।
अब हमारी अयोध्यापुरी, वेटिकन सिटी और मक्का जैसे वैश्विक धार्मिक केंद्रों को पीछे छोड़ते हुए दुनिया की सबसे बड़ी धार्मिक पर्यटन नगरी के रूप में उभर रही है। यह भारत की कोमल सत्ता यानी सॉफ्ट पावर का प्रदर्शन है। विदेशी मुद्रा का प्रवाह और वैश्विक पटल पर भारत की सांस्कृतिक धाक, मंदिरों के माध्यम से ही सशक्त हो रही है।
मंदिर परंपराओं का संरक्षण और सामाजिक समरसता में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। मंदिर केवल पत्थर की संरचनाएं नहीं, बल्कि कला के संरक्षक भी हैं। मंदिर निर्माण से लुप्त होती मूर्तिकला, नक्काशी और वास्तुशास्त्र की विधाओं को नया जीवन मिला है। कलाकारों को भी मंदिरों के जरिए रोजगार मिल रहा है। इसके साथ ही, मंदिरों के माध्यम से संचालित होने वाले अन्नक्षेत्र, चिकित्सालय और शिक्षण संस्थान सामाजिक सुरक्षा तंत्र को मजबूती प्रदान करते हैं और इनकी व्यवस्था में लगे सेवकों को भी गरिमापूर्ण रोजगार मिलता है।
अयोध्या का उदाहरण यह स्पष्ट करता है कि मंदिर निर्माण से समाज के हर वर्ग को लाभ मिलता है। चाहे वह निर्माण कार्य में लगा श्रमिक हो, या प्रसाद बनाने वाला हलवाई; मंदिर का आर्थिक तंत्र समावेशी विकास का सबसे सटीक उदाहरण है। अयोध्या सहित देश के विभिन्न प्रसिद्ध मंदिर जिनमें विशेषतः महाकालेश्वर, अन्य बारह ज्योतिर्लिंग, सांवलिया सेठ, खाटू श्याम मंदिर और नाथद्वारा आदि में नववर्ष के अवसर पर उमड़ी भीड़ यह सिद्ध करती है कि लोग अब शांति और प्रगति के लिए अपनी संस्कृति की ओर देख रहे हैं।
आज अयोध्या केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आधुनिक भारत के सांस्कृतिक और आर्थिक पुनरुत्थान का केंद्र बन चुकी है। करोड़ों श्रद्धालुओं का विश्वास यह बताता है कि धर्म जब विकास के साथ जुड़ता है, तो वह राष्ट्र के भाग्य को बदल देता है। आध्यात्मिक पर्यटन द्वारा मंदिरों से मिलने वाला यह राजस्व और रोजगार देश की अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगा। यह समय भारत के गौरवशाली अतीत को आधुनिक प्रगति के साथ जोड़कर एक स्वर्णिम भविष्य की रचना करने का है। अयोध्या की यह सफलता उन सभी तर्कों का उत्तर है जो धर्म को प्रगति में बाधक मानते थे। वास्तव में, जहां राम हैं, वहीं राष्ट्र की संपूर्ण प्रगति के आयाम हैं।

- सपना सी.पी. साहू स्वप्निल


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