चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में "मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की सेवाएँ" विषय पर ऑनलाइन कार्यक्रम का आयोजन
नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। मौलाना आज़ाद के व्यक्तित्व से सभी परिचित हैं। वे पत्रकारिता से जुड़े रहे और दूरदर्शिता के साथ काम किया। अपने समय में उनकी आलोचना भी हुई। उनकी दूरदर्शिता भी अद्भुत है, यही वजह है कि सैकड़ों साल पहले कही गई उनकी बातों का महत्व आज भी कायम है। भारत के सभी शिक्षा मंत्रियों की सेवाएँ एक तरफ़ हैं और उन पर मौलाना आज़ाद की शैक्षिक सेवाएँ ही भारी हैं। आधुनिक चिकित्सा संस्थानों और शिक्षा के क्षेत्र में आपकी सेवाएँ सराहनीय हैं। ये शब्द थे प्रसिद्ध शोधकर्ता और आलोचक प्रोफ़ेसर ज़ाहिदुल हक़ के, जो आयुसा और उर्दू विभाग द्वारा आयोजित "मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की सेवाएँ" विषय पर अपना व्याख्यान दे रहे थे।
उन्होंने आगे कहा कि आयुसा के तत्वावधान में युवा पीढ़ी को बहुत अच्छे ढंग से प्रशिक्षित किया जा रहा है। इससे पहले, कार्यक्रम की शुरुआत सईद अहमद सहारनपुरी ने पवित्र कुरान की तिलावत से की। ने की और अध्यक्षता प्रख्यात लेखक एवं आलोचक प्रोफेसर सगीर इफराहीम ने की। विशिष्ट अतिथि प्रोफेसर रियाज अहमद [प्राचार्य, शिक्षक शिक्षा महाविद्यालय, नूह, मानू], प्रोफेसर जाहिदुल हक [उर्दू विभाग, केंद्रीय विश्वविद्यालय, हैदराबाद] और विशिष्ट अतिथि डॉ. मुजाहिदुल इस्लाम [एसोसिएट प्रोफेसर, उर्दू विभाग, मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय, लखनऊ ], डॉ. कहकशा लतीफ [अनुवाद विभाग, मानू, हैदराबाद] और डॉ. मुहम्मद अकमल [केएमसी, लखनऊ] थे। वक्ताओं में लखनऊ से आयुसा की अध्यक्षा प्रोफेसर रेशमा परवीन और मेरठ से जीशान खान शामिल थे। स्वागत भाषण ताहिरा परवीन ने , संचालन इलमा नसीब दिया और धन्यवाद ज्ञापन मुहम्मद हारून ने किया।
विषय प्रवेश कराते हुए डॉ. इरशाद स्यानवी ने कहा कि साहित्य का हर पाठक मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की सेवाओं से परिचित है। फिर भी, मौलाना के जीवन के कई पहलू ऐसे हैं जिन पर हमारे विद्वान चिंतन और मनन करते रहते हैं। ऐसे छात्रों और शोधार्थियों के मार्गदर्शन के लिए आज का यह कार्यक्रम अपने आप में एक विशिष्ट स्थान रखता है। हमारे विद्वान आज तक मौलाना आज़ाद की राजनीतिक, सामाजिक और शैक्षिक सेवाओं से लाभान्वित हो रहे हैं। वे एक बहुमुखी व्यक्तित्व के धनी थे।
प्रोफ़ेसर असलम जमशेदपुरी ने कहा कि मौलाना अबुल कलाम आज़ाद एक अच्छे पत्रकार, प्रबंधक, शिक्षाविद्, अच्छे लेखक और एक उत्कृष्ट राजनीतिक नेता थे। मौलाना आज़ाद देश के पहले शिक्षा मंत्री थे। शिक्षा के क्षेत्र में उनके द्वारा किए गए मौलिक कार्य आज भी याद किए जाते हैं। उनके भाषण हमें सोचने पर मजबूर करते हैं। जामिया मस्जिद की सीढ़ियों पर खड़े होकर दिया गया उनका भाषण अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने साझी सभ्यता का प्रचार-प्रसार किया।
डॉ. मुहम्मद अकमल ने कहा कि मौलाना अबुल कलाम आज़ाद को पहला शिक्षा मंत्री बनाया गया था। जामिया विश्वविद्यालय की स्थापना मौलाना आज़ाद ने की थी। उन्होंने शैक्षिक पुस्तकालयों की भी स्थापना की। उन्होंने महिला शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया। उनके अनुसार, शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य का पुनर्निर्माण करना था। उन्होंने मुस्लिम समाज के सुधार के लिए चिंतन और मनन किया। वे मुसलमानों की राजनीतिक और आर्थिक स्थिति से अच्छी तरह वाकिफ थे।
ज़ीशान खान ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि अगर हम 'अल-हिलाल' की बात करें, तो हम देखते हैं कि मौलाना ने कहा था कि हम अपनी भौतिक संपत्ति और उपकरणों को वर्ग और भौगोलिक सीमाओं में सीमित कर सकते हैं, लेकिन हम शिक्षा और सभ्यता को सीमित नहीं कर सकते क्योंकि यह सभी मनुष्यों की विरासत है और इसमें लापरवाही से बड़ा कोई अपराध नहीं हो सकता। हे भारतवासियों, आपका एक ही लक्ष्य होना चाहिए और वह है देश की आज़ादी और अगर आप इसके लिए अपनी जान भी दे देते हैं, तो पूरा देश आपके इस बलिदान पर गर्व करेगा और आने वाली पीढ़ियाँ आपको याद रखेंगी और आपकी मिसाल दी जाएगी।
डॉ. कहकशा लतीफ़ ने कहा कि हम अपने बुजुर्गों को बहुत जल्दी भूल जाते हैं। सर सैयद, मौलाना आज़ाद और अल्लामा इक़बाल ऐसे नेता थे जिन्हें आज हम भूल चुके हैं, लेकिन मौलाना अबुल कलाम आज़ाद एक ऐसी महत्वपूर्ण शख़्सियत हैं जिनकी सेवाएँ अपार हैं। हम मौलाना आज़ाद को तो याद करते हैं, लेकिन उनकी सेवाओं से अभी भी अनजान हैं। "लिसनन-उल-सिद्दक" उनकी महत्वपूर्ण रचनाओं में से एक है, जो शिक्षा के महत्व और उनकी रचनात्मक क्षमता पर प्रकाश डालती है। इस अवसर पर सैयद अनवर सफ़ी ने मौलाना अबुल कलाम आज़ाद पर अपना सुंदर शोधपत्र प्रस्तुत किया।
प्रोफेसर रियाज़ अहमद ने कहा कि मौलाना आज़ाद ने भविष्य की ज़रूरतों के मद्देनज़र शिक्षा व्यवस्था हमारे सामने पेश की। जब हमें आज़ादी मिली, तब हमारी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। उस समय मौलाना आज़ाद ने राजनीतिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक सेवाओं का बखूबी निर्वहन किया।
अपने अध्यक्षीय भाषण में प्रोफेसर सगीर अफ़राहीम ने कहा कि मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और सर सैयद दोनों ने ही महिलाओं की शिक्षा पर ज़ोर दिया। मौलाना आज़ाद अपने विषयों के अनुसार जिस भी सभा में जाते थे, वहाँ छा जाते थे। हमें मौलाना अबुल कलाम आज़ाद जैसे नेता के पदचिन्हों पर चलना चाहिए। मौलाना अबुल कलाम आज़ाद हमारे लिए एक आदर्श हैं। खानकाहों का शिक्षा, सभ्यता और प्रशिक्षण की दृष्टि से बहुत महत्व रहा है। मौलाना भी खानकाह से जुड़े थे। कार्यक्रम में डॉ. आसिफ अली, डॉ. शादाब अलीम, डॉ. अलका वशिष्ठ, मुहम्मद शमशाद और छात्र शामिल थे।
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