नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय तकनीकी शिक्षक प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान चंडीगढ़ के सहयोग से चल रहे शोध पद्धति पर एक सप्ताहीय अल्पावधि कार्यक्रम के अंतर्गत दूसरे दिन के सत्रों का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों से आए कुल 177 प्रतिभागियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
प्रख्यात शिक्षाविद् प्रो. दिनेश कुमार ने पहले दो सत्रों का संचालन किया। पहले सत्र में उन्होंने डेटा कलेक्शन टूल्स विषय पर विस्तारपूर्वक व्याख्यान देते हुए बताया कि किसी भी शोध की विश्वसनीयता और निष्कर्षों की प्रमाणिकता मुख्य रूप से डाटा संकलन की पद्धतियों पर निर्भर करती है। उन्होंने प्रश्नावली, साक्षात्कार, प्रेक्षण, सर्वेक्षण तथा मिश्रित तकनीकों की महत्ता और उनके प्रयोग की व्यावहारिक चुनौतियों पर प्रकाश डाला। दूसरे सत्र में उन्होंने टी-टेस्ट की प्रक्रिया समझाते हुए बताया कि यह परीक्षण शोध में सांख्यिकीय विश्लेषण की एक अनिवार्य विधि है। इसके माध्यम से दो समूहों के औसत में अंतर की वास्तविकता को परखा जा सकता है। प्रो० दिनेश कुमार ने इसे उदाहरणों और शोध अध्ययनों के माध्यम से स्पष्ट किया, जिससे प्रतिभागियों को व्यावहारिक दृष्टि से इसकी उपयोगिता समझ आई।
भोजनावकाश के बाद तीसरे सत्र में वरिष्ठ प्राध्यापक एवं चंडीगढ़ के समन्वयक प्रो० ए०बी० गुप्ता ने कोरिलेशन एवं रिग्रेशन विषय पर व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि शोध में चर के बीच संबंध को समझने और भविष्यवाणी करने में सहसंबंध और प्रतिगमन जैसी सांख्यिकीय तकनीकें अत्यंत उपयोगी सिद्ध होती हैं। प्रो० गुप्ता ने संख्यात्मक उदाहरणों एवं केस स्टडीज के माध्यम से इन तकनीकों का प्रयोग स्पष्ट किया, जिससे प्रतिभागियों को विषय की गहन समझ प्राप्त हुई।
कार्यक्रम का संचालन आंतरिक समन्वयक डॉ० विजेता गौतम ने किया। इस अवसर पर सह-समन्वयक डॉ० भावना सिंह, डॉ० निधि गुप्ता, डॉ० वीर सिंह, डॉ० वर्षा तथा आनंदिता दास भी सक्रिय रूप से उपस्थित रहीं। डा० गौतम ने प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए कहा कि प्रमाणपत्र प्राप्त करने के लिए सभी सत्रों में उपस्थिति अनिवार्य है और यह अनुशासन ही शोध कार्य का पहला कदम है।
चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय शोध एवं नवाचार को बढ़ावा देने के लिए निरंतर प्रयासरत है। माननीय कुलपति महोदया प्रो० संगीता शुक्ला के नेतृत्व में विश्वविद्यालय ने शोधोन्मुख वातावरण को बढ़ाने के लिए कई ठोस कदम उठाए हैं। उनका मानना है कि समाज की प्रगति शोध और नवाचार पर आधारित है, और इसी दृष्टिकोण से यहाँ विभिन्न विभागों में शोधपरक गतिविधियों को निरंतर प्रोत्साहित किया जा रहा है।
कुलपति के मार्गदर्शन में विश्वविद्यालय समय-समय पर कार्यशालाओं, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और शोध उन्मुख व्याख्यानों का आयोजन करता है, जिससे अध्यापक और शोधार्थी नई पद्धतियों और तकनीकों से परिचित हो सकें। उनके दूरदर्शी नेतृत्व ने विश्वविद्यालय को न केवल क्षेत्रीय स्तर पर बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी एक शोध केंद्रित संस्थान के रूप में स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

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