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Thursday, September 18, 2025

”लोलाक“ एक बड़ी नज़्म ही नहीं, बल्कि इस्लाम के बहुत से मसाइल को पेश करती है: डॉक्टर त़क़ी आबिदी



शोबे-ए उर्दू में सीसीएस यूनिवर्सिटी में ”लोलाक: इजरा व समीक्षा मौज़ू" पर ऑनलाइन प्रोग्राम का आयोजन

नित्य संदेश ब्यूरो 
मेरठ।
चंदर भान ख़याल की नज़्म ”लोलाक“ की अज़मत और मक़ाम यह है कि ”लोलाक“ एक बड़ी नज़्म ही नहीं बल्कि इस्लाम के बहुत से मसाइल को पेश करती है। इस नज़्म का फ़नकार जो दिल्ली में मुक़ीम है और जो कहता है कि मुझे चौथी जमाअत में पैग़ंबर-ए-इस्लाम से आशनाई हुई। ऐसे फ़नकार को जाँचने और समझने की ज़रूरत है। चंदर भान ख़याल फ़ितरी और क़ादिर-उल-कलाम शायर हैं। यह अल्फ़ाज़ थे मारूफ़  आलोचक डॉक्टर त़क़ी आबिदी [कनाडा] के जो आयुसा और शोबे-ए उर्दू के ज़ेरे एहतेमाम आयोजित ”लोलाक : इजरा व समीक्षा “ मौज़ू पर अपनी तक़रीर के दौरान अदा कर रहे थे।

उन्होंने आगे कहा कि हमने जब से होश संभाला है नबीؐ के अख़लाक़, किरदार, सीरत, तालीम और हिदायत को समझा और पढ़ा है लेकिन चंदर भान ख़याल को ऐसा ख़याल क्यों आया कि आपने हयाते नबीؐ पर यह बड़ी नज़्म लिखी। ऐसे फ़नकार को समझने की ज़रूरत है। कभी-कभी एक शेर एक दीवान पर भारी पड़ जाता है। नज़्म में दोनों आलम के ख़ालिक़ का ज़िक्र है। चंदर भान ख़याल की ज़बान का कमाल यह है कि वे हिंदी, अरबी, फ़ारसी, उर्दू, संस्कृत वग़ैरह का इस्तेमाल कर के ऐसे मिसरे तख़्लीक़ करते हैं जिनकी इनफ़िरादियत हमेशा बाक़ी रहेगी।

इससे पहले प्रोग्राम का आग़ाज़ मुहम्मद नदीम ने तिलावत-ए कलाम-ए पाक से किया। अध्यक्षता प्रोफेसर सग़ीर अफराहीम ने की। मुख्य अतिथि के रूप में मारूफ़ शायर चंदर भान ख़याल ने शिरकत फ़रमाई। वक्ता के रूप में प्रोफेसर रेशमा परवीन और स्तुति अग्रवाल [सब-एडिटर इंतिसाब और आलमी ज़बान, सरोंज] मौजूद रहीं। परिचय  डॉक्टर इरशाद स्यानवी, संचालन  डॉक्टर शादाब अलीम और शुक्रिया डॉक्टर शबिस्तां आस मुहम्मद ने किया।

डॉक्टर शादाब अलीम ने चंदर भान ख़यालؔ का परिचय पेश करते हुए कहा कि व्यक्ति से व्यक्तित्व तक का सफर बहुत लंबा होता है। यह सफर कठिन रास्तों से होकर गुजरता है। इसके लिए निरंतर प्रयास और लगन की आवश्यकता होती है। इसके अलावा, गहन अध्ययन, सजग मन, धैर्य और उदारता का होना आवश्यक है। क्योंकि ऐसा व्यक्तित्व देश और राष्ट्र की अमूल्य धरोहर होता है। वह नई पीढ़ी को संगठित करने के लिए कृतसंकल्पित होता है। ऐसे ही एक सक्षम, करिश्माई व्यक्तित्व हैं चंद्रभान ख्याल। आप आज के कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि हैं। साहित्य के सभी गुण आपमें विद्यमान हैं।शख़्स से शख़्सियत का सफ़र बहुत लंबा होता है।

इस मौक़े पर प्रोफेसर असलम जमशेदपुरी ने कहा कि मैं मुबारकबाद देता हूँ त़क़ी आबिदी साहब और चंदर भान ख़याल को कि उनकी कोशिशों से आज ”लोलाक“ के नाम से अहम तसनीफ़ मंज़रे आम पर आई। चंदर भान ख़याल और त़क़ी आबिदी साहब को मश्विरा देना चाहता हूँ कि इस किताब का नाम ”लोलाक का तजज़िया“ होना चाहिए। इस नज़्म में कोलाज़ तकनीक का इस्तेमाल हुआ है और यह नज़्म छः हिस्सों में बंटी है। यह किताब त़क़ी आबिदी की है इसलिए किताब का तजज़िया भी वही करेंगे। मैं दोनों को मुबारकबाद देता हूँ।

स्तुति अग्रवाल ने कहा कि चंदर भान ख़याल ने इस लंबी नज़्म को हृदयस्पर्शी और अनूठे अंदाज में प्रस्तुत किया है। अगर कोई मुसलमान "लोलाक" जैसी कविता के बारे में सोचता, तो यह ईमान की एक मज़बूत वजह हो सकती थी, लेकिन एक ग़ैर-मुस्लिम के लिए "लोलाक" जैसी कविता लिखना अपने आप में एक बड़ी और महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
चंद्रभान ख़याल ने कहा कि आज का कार्यक्रम सुनने के बाद मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मैंने सचमुच कुछ कर दिखाया है। मैं नबी के जीवन से इतना प्रभावित हूँ कि मैं जो कुछ भी कहूँगा वह बहुत कम होगा। मैंने इस नज़्म में सब कुछ प्रस्तुत कर दिया है।

प्रोफ़ेसर रेशमा परवीन ने कहा कि आज का कार्यक्रम नात के रूप में नज़्म पर आधारित एक कार्यक्रम है, जिसकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है। इस कार्यक्रम की ख़ूबसूरती यह है कि यह नबी के जीवन के पहलुओं पर प्रकाश डालता है। नबी सबके हैं। ख़याल साहब ने इस कविता में अज्ञानता के युग से लेकर नबी के आगमन तक के हालात को शामिल किया है। जब भी नात और शायरी पर चर्चा होगी, इस किताब का ज़िक्र ज़रूर होगा। इस मौके पर फरहत अख्तर ने नज़्म के पाँच शेर भी सुनाए।

अपने अध्यक्षीय भाषण में प्रोफ़ेसर सगीर अफराहीम ने कहा कि इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम के लिए कोई एक नहीं, बल्कि सभी बधाई के पात्र हैं। अगर सर सैयद को हाली न मिलते तो बहुत देर हो जाती और अगर चंद्रभान को तकी आबिदी पहले ही मिल जाते तो यह किताब लोकप्रिय हो जाती। किताब में तकी आबिदी का विश्लेषण बेमिसाल है। लेखक और टिप्पणीकार कंधे से कंधा मिलाकर चलते नज़र आते हैं। जिस तरह उजाले का जन्म हुआ और अँधेरे का अंत हुआ, उसी तरह चंद्रभान ख़याल इस किताब में घटनाओं को लगातार जोड़ते चले जाते हैं। उन्होंने अज्ञानता के दौर से लेकर पैगम्बर के जीवन तक के दौर को बेहद खूबसूरती से पेश किया है। प्रोग्राम से डॉक्टर आसिफ अली, डॉ अलका वशिष्ठ, मुहम्मद ईसा राना, मुहम्मद जुबैर, शाहे ज़मन, मुहम्मद शमशाद और जुड़े रहे। 

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