नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। सर सैयद की उपलब्धि यह है कि उन्होंने मूल रूप से हमारे साहित्य को एक नई गति दी। उन्होंने 1875 में मदरसा उलूम की स्थापना की जो बाद में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के रूप में उभरा। सर सैयद ने हमारी पत्रकारिता, चिंतन, शिक्षा और समाज को नई सोच दी। सर सैयद ने हमें आधुनिक विज्ञान की ओर प्रेरित किया। जब हम अंग्रेजी गुलामी में थे तो सर सैयद ने हमसे कहा था कि जब तक हम शिक्षित नहीं होंगे तब तक हम सफल नहीं हो सकते। यह शब्द थे प्रसिद्ध विद्वान प्रो अख्तर उल वासे के जो उर्दू विभाग,चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय और इंटरनेशनल न्यू उर्दू स्कॉलर्स एसोसिएशन (आईयूएसए) द्वारा आयोजित संगोष्ठी में "भारत के पुनर्निर्माण में सर सैयद की भूमिका" विषय पर अध्यक्षीय भाषण के दौरान कह रहे थे।
उन्होंने आगे कहा कि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उर्दू भाषा और साहित्य, आधुनिकीकरण या उत्तर आधुनिकतावाद या प्रगतिशील आंदोलन के क्षेत्र को अलीगढ़ से अलग करके नहीं देखा जा सकता है। आन्दोलन जीवित मस्तिष्क को जन्म देते हैं। कार्यक्रम की शुरुआत बीए उर्दू प्रथम वर्ष के छात्र मोहम्मद नदीम की तिलावत और फरहत अख्तर की नात से हुई। मुख्य अतिथि के रूप में जाने-माने विद्वान प्रो. अख्तर उल वासे [पूर्व कुलपति, मौलाना आजाद विश्वविद्यालय, जोधपुर] और विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रो. सगीर इफ्राहीम (पूर्व अध्यक्ष उर्दू विभाग, अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय) ने भाग लिया, जबकि रिसर्च स्कॉलर सैयदा मरियम इलाही ने शोध वक्ता के रूप में भाग लिया। वक्ता के रूप में आयुसा की अध्यक्ष प्रो. रेशमा परवीन लखनऊ से ऑनलाइन उपस्थित रहीं। स्वागत भाषण डॉ. आसिफ अली, परिचय डॉ. इरशाद स्यानवी तथा आभार डॉ. शादाब अलीम ने किया।
विषय प्रवर्तन करते हुए डॉ. इरशाद स्यानवी ने कहा कि यदि हम विचार करें तो सर सैयद का व्यक्तित्व तीन भागों में बंटा हुआ है। वे एक लेखक, धार्मिक व्यक्ति और राष्ट्रीय नेता भी थे। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, उर्दू भाषा की आम समझ और राष्ट्र के सुधार के लिए राष्ट्र की शिक्षा और विकास के लिए सर सैयद की उपलब्धियों का जीवंत उदाहरण हैं। सर सैयद ने साहित्य में एक नई शैली की शुरुआत की, जिनमें "द कॉज ऑफ इंडियन रिवोल्ट, हिस्ट्री ऑफ बिजनोर डिस्ट्रिक्ट, अतर अल-सनदीद, खुतबत अहमदिया, रिसाला तहबीह-उल-अखलाक आदि शामिल हैं। उनके प्रयासों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इस मौके पर उर्दू विभाग के अध्यक्ष प्रो असलम जमशेदपुरी ने कहा कि भारत चांद पर नहीं बल्कि सूरज तक पहुंचा है. भारत को इस मुकाम तक कैसे पहुंचाया जाए, इस पर विचार करें तो पता चलेगा कि उन्नीसवीं सदी में कई शख्सियतों ने योगदान दिया, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी इसका जीता जागता उदाहरण है। आज सर सैयद हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनके सपनों, कार्यों को आगे बढ़ाकर भारत के विकास के लिए काम करें।
प्रोफेसर सगीर अफ्राहीम ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि सर सैयद ने 1851 से पहले ही लिखना और छपाई शुरू कर दी थी. सर सैयद ने ऐसा करके दिखाया कि समाज में हमें प्यार से काम करना चाहिए और नफरत से दूर रहना चाहिए। सर सैयद ने सिर्फ छात्रों के लिए ही नहीं बल्कि महिलाओं के लिए भी काम किया है. सर सैयद ने अपने कार्य, संघर्ष और प्रयासों से यह बताने का प्रयास किया कि हमें स्थिति को शीघ्रता से समझना चाहिए और भारत के पुनर्निर्माण के लिए सदैव प्रयासरत रहना चाहिए।
आयुसा की अध्यक्ष प्रो रेशमा परवीन ने कहा कि सर सैयद ने न सिर्फ नई पीढ़ी के विकास में बल्कि देश के विकास में भी अहम भूमिका निभाई है. सर सैयद ने अपनी मेहनत और कोशिशों से ऐसे कारनामे किये कि आज उन्हें सम्मान के साथ याद किया जाता है। इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में भाग लेने और इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए मैं आप सभी को धन्यवाद देती हूं।
अपने अध्यक्षीय भाषण में आरिफ नकवी ने कहा कि सर सैयद ने इस्लाम को नयी रोशनी से पेश किया. सर सैयद ने शिक्षा, मानव जीवन और विरोधियों से निपटने आदि विषयों को इस्लाम से लिया है और समझदारी से प्रस्तुत किया है। सर सैयद ने अपने चरित्र से दूसरों को प्रेरित किया। सर सैयद ने मुसलमानों को डूबने से बचाया उन्होंने समझाया कि हमें मानवता और अन्य धर्मों के लोगों पर भी विश्वास रखना चाहिए। कार्यक्रम से डॉ. अलका वशिष्ठ, सईद अहमद सहारनपुरी, मोहम्मद शमशाद आदि जुड़े रहे।
No comments:
Post a Comment