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Saturday, October 3, 2026

इतिहास भारतीय ज्ञान परंपरा में 'पंचम वेद' है: डॉ.बालमुकुंद पांडे

नित्य संदेश। इतिहास संकलन समिति, दक्षिण बिहार के आयोजक दल एवं माधव संस्कृति न्यास ,अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वाधान में "इतिहास- लेखन की भारतीय परंपरा " विषयक दशम युवा इतिहासकारों का द्वि -दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन विक्रम संवत,2083 के अश्विन पक्ष में देवमंगल सभागार गोपाल नारायण सिंह विश्वविद्यालय, जमुहार रोहतास (बिहार)में संपन्न हुआ। 

संगोष्ठी का मौलिक उद्देश्य भारतीय इतिहास- लेखन के समृद्ध एवं उच्चीकृत परंपरा ,उसकी वैचारिक दृष्टि, स्रोत -परंपरा एवं पद्धतिगत विशेषताओं पर युवा इतिहासकारों का विद्वत - विमर्श को प्रोत्साहित करना एवं युवा इतिहासकारों को शोध एवं इतिहास- लेखन के क्षेत्र में नूतन आयाम व नवीन दृष्टिकोण से परिचित कराना है।

                                संगोष्ठी के मुख्य वक्ता एवं अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना, नई दिल्ली के राष्ट्रीय संगठन सचिव आदरणीय डॉ. बालमुकुंद पांडे जी ने अपने उद्बोधन के प्रारंभ में सभी विद्वानों, आयोजकों एवं प्रतिभागियों के प्रति हृदय तल से धन्यवाद दिए। उन्होंने कहा कि हमारा कार्य केवल सीमित परिसर अथवा कृत्रिम परिवेश में विकसित होने वाला कार्य नहीं है। हम' गमले के फूल' नहीं बल्कि 'बन के फूल ', जिनका विकास व्यापक सामाजिक एवं राष्ट्रीय परिवेश में होता है । उन्होंने कहा कि छोटे-छोटे कार्यक्रमों और सतत प्रयासों के माध्यम से ही राष्ट्रीय स्तर के व्यापक कार्यों की आधार भूमि तैयार होती है।

                          डॉ पांडे जी ने भारतीयता की भावना को इतिहास -साधना का महत्वपूर्ण आधार बताते हुए कहा कि भारतीय समाज को योजित करने वाली मूल चेतना उसकी "संस्कृति एवं सभ्यतागत निरंतरता में निहित है।" प्राचीन काल से भारत ज्ञान ,चिंतन, दर्शन ,विमर्श एवं बौद्धिक परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।

                 इतिहास- लेखन में औपनिवेशिक एवं विकृत दृष्टिकोण की चर्चा करते हुए कहा कि विभिन्न कालखंडों में भारतीय इतिहास की व्याख्या को प्रभावित करने वाले अनेक प्रयास हुए हैं। उन्होंने सभी से राष्ट्रीय चित्ती के इतिहासकार भगवत दत्त की पुस्तकों का अध्ययन करने का आग्रह किए। इतिहास -संकलन के विभिन्न प्रकल्पों पर विमर्श करते हुए युवा इतिहासकारों के भूमिका को महत्वपूर्ण माना। युवा शोधकर्ता इतिहास- लेखन को नई दिशा देने के साथ भारतीय परंपराओं, मानवीय मूल्यों और आदर्शों को समग्र रूप से समाज को ज्ञानरूपी पुरुषार्थ एवं अमृत से पुनर्जागृत कर सकते हैं।

                         इतिहास लेखन का उद्देश्य अतीत का संकलन भर नहीं है, बल्कि उसके शानदार तात्विक मूल्य एवं सामाजिक प्रभाव को समझना है। भारतीय इतिहास और संस्कृति की समृद्ध परंपरा को उन्नयन करके "विकसित भारत 2047" के लक्ष्य की प्राप्ति में सक्रिय और रचनात्मक योगदान देने का आवाहन किए।

                      संगोष्ठी के मुख्य अतिथि श्रीमान संजय सिंह टाइगर उच्च शिक्षा मंत्री, बिहार सरकार ने सभी को हृदय से आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इतिहास भारतीय ज्ञान परंपरा का प्रकाश- स्तंभ है। भारतीय इतिहास लेखन परंपरा को धरातल पर मजबूत करने की समकालीन में आवश्यकता है।

                           संगोष्ठी के विशिष्ट अतिथि श्रीमान मिथिलेश तिवारी बेसिक शिक्षा मंत्री, बिहार सरकार रहे हैं ।उन्होंने इतिहास -लेखन को भारतीयता की भावना पर आधारित होना चाहिए। उन्होंने इतिहास के पुनर्लेखन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका एवं उपादेयता को रेखांकित किया।


                      संगोष्ठी के सारस्वत अतिथि प्रोफेसर ( डॉ.) कामेश्वर नाथ सिंह कुलगुरु ,दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय ने सभी के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इतिहास और भूगोल का गहरा तादात्म्य संबंध है। उन्होंने दोनों को पति-पत्नी के समान परस्पर पूरक बताते हुए कहा कि इतिहास के बिना भूगोल और भूगोल के बिना इतिहास "अधूरा" है। उन्होंने शिक्षा के माध्यम से "आदर्श व्यक्तियों" के निर्माण पर बल दिया।


                            संगोष्ठी की अध्यक्षता प्रोफेसर (डॉ) ईश्वर शरण विश्वकर्मा, राष्ट्रीय अध्यक्ष, अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना ने किए। उन्होंने अंत: चेतन को नमन करते हुए इतिहास लेखन के उन्नयन में युवा इतिहासकारों के महत्वपूर्ण भूमिका तथा भारतीय ज्ञान परंपरा में इतिहास के महत्व को रेखांकित किए।

      संगोष्ठी के संरक्षक श्रीमान गोपाल नारायण सिंह ने किए। उन्होंने सभी को हृदय तल से आभार प्रकट किए।उन्होंने इतिहास में शोध के लिए बहुविषयक उपागम से काम करने के लिए प्रेरित किए। दिग्भ्रमित इतिहास को सही करना इतिहास के प्रति उचित एवं न्याय होगा। इतिहास को नए आयाम देने की आवश्यकता है। संकलित इतिहास को समाज में विवेकी प्रसारण एवं समाज को उच्चीकृत करना समकालीन में आवश्यकता है।

              सभी अतिथियों का परिचय एवं स्वागत भाषण डॉ. राम प्रकाश शर्मा ने दिया। उन्होंने सभी का संक्षिप्त परिचय भी आयोजकों, प्रतिभागियों एवं शोधकर्ताओं के सामने प्रस्तुत किया।

                                        संगोष्ठी को राष्ट्रीय युवा इतिहासकार प्रमुख डॉ. विकास कुमार सिंह ने संबोधित किए। उन्होंने सभी को हृदय तल से धन्यवाद दिए।

                     डायस का संचालन दिल्ली प्रांत के महासचिव डॉ. निर्मल पांडे जी ने किया। कार्यक्रम में दिल्ली प्रांत से डॉ.नरेंद्र शुक्ला, डॉ.प्रदीप कुमार उपाध्याय, डॉ.सत्यप्रकाश जी, डॉ.कौशलेंद्र जी, डॉ.पीयूष मिश्रा, डॉ वैभव एवं देश के विभिन्न प्रांतों से लगभग लगभग 600प्रतिभागियों ने सक्रिय सहभागिता किए हैं।

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