नित्य संदेश
ठहरा हुआ सुकून...
मेरे अंदर तक ठहरा हुआ सुकून है वो
मेरा दिल नहीं, मेरी आत्मा है वो।
वो जो तुम समझे—
मेरा पागलपन,
नहीं नहीं, वही सच्चाई है।
मैं जो दिख रही, मैं हूँ वो, वो है।
मैं वो हूँ, वो मैं हूँ,
क्यों है ऐसा, ये समझ नहीं आएगा।
दिल का सुकून कहाँ समझ पाएगा,
कहते हो "इश्क़" लफ़्ज़ अधूरा है,
गौर से देखो, एक रूह दो जिस्म का वहाँ डेरा है।
इबादत जिसे कहते हैं,
रूह की ग़िज़ा है,
मिलता नहीं यह ऐज़ाज़ सबको,
क़िस्मत वालों को इश्क़ रब ने बख़्शा है।
फ़क़त कहने की बात नहीं,
आशिक़ी, दीवानगी, फ़क्कड़पन ही इश्क़ का फेरा है।
— डॉ. शबनम सुल्ताना


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