नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग के अंतर्गत सेंटर ऑफ मेंटल हेल्थ एंड वेलबीइंग द्वारा मेंटल हेल्थ मिशन इंडिया के सहयोग से विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर “मानसिक स्वास्थ्य पर बातचीत का समय” विषय पर राष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाना, इससे जुड़े सामाजिक कलंक को कम करना तथा लोगों को सहायता प्राप्त करने के लिए प्रेरित करना था। कार्यक्रम में 60 से अधिक प्रतिभागियों ने सहभागिता की।
कार्यक्रम के स्वागत उद्बोधन में मनोविज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. संजय कुमार ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा सामाजिक कलंक लोगों के सहायता प्राप्त करने के व्यवहार को प्रभावित करता है। उन्होंने विशेष रूप से किशोरों और महिलाओं में बढ़ती मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की गंभीरता को समझने तथा समय रहते उचित सहायता उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर बल दिया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रो. जे. ए. सिद्दीकी ने युवाओं की जीवनशैली से जुड़ी चुनौतियों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि सर्वेक्षणों के अनुसार 60 प्रतिशत से अधिक विद्यार्थी देर रात तक जागते हैं तथा फास्ट फूड और जंक फूड के बढ़ते प्रचलन ने भी स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं को बढ़ाया है। उन्होंने कहा कि युवाओं को सही और गलत के प्रति जागरूक करना आवश्यक है, लेकिन वे इन जानकारियों को अपने जीवन में किस प्रकार अपनाते हैं, यह काफी हद तक उनके अपने व्यवहार और निर्णयों पर निर्भर करता है।
वेबिनार के मुख्य वक्ता ने मानसिक स्वास्थ्य साक्षरता की कमी को सहायता प्राप्त करने में एक प्रमुख बाधा बताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि उदास मनोदशा का अर्थ हमेशा अवसाद नहीं होता, इसलिए मानसिक स्वास्थ्य संबंधी शब्दों और समस्याओं को सही संदर्भ में समझना आवश्यक है। उन्होंने बताया कि मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की शुरुआत कई बार 10 से 12 वर्ष की आयु में ही हो सकती है तथा प्रत्येक सात व्यक्तियों में से लगभग एक व्यक्ति मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्या से प्रभावित होता है।
वक्ता ने कहा कि जब कोई व्यक्ति मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्या से प्रभावित होता है, तो उसका प्रभाव केवल उस व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरा परिवार और समाज प्रभावित होता है। उर जब समाज प्रभावित होता है तो नेचर प्रभावित होता है। उन्होंने अत्यधिक कार्यभार, छूट जाने के भय, लगातार आने वाली सूचनाओं और डिजिटल माध्यमों के बढ़ते दबाव को मानसिक स्वास्थ्य के लिए चुनौतीपूर्ण बताया। उन्होंने यह भी कहा कि आज हम सूचनाओं और आँकड़ों से घिरे हुए हैं, लेकिन विश्वसनीय एवं स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप आँकड़ों की उपलब्धता एक महत्वपूर्ण चुनौती है। विकसित देशों में तैयार नीतिगत ढाँचों को विकासशील देशों में लागू करने से कई बार सेवाओं तक सीमित पहुँच तथा अनुपयुक्त आँकड़ों जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
उन्होंने मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए सरकारी बजट में पर्याप्त वृद्धि की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि संसाधनों के अपर्याप्त आवंटन के कारण प्रशिक्षित एवं दक्ष पेशेवरों का विकास प्रभावित होता है और लोगों को गुणवत्तापूर्ण मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराने में कठिनाइयाँ आती हैं। उन्होंने मानसिक स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशील एवं कलंक-मुक्त भाषा के प्रयोग पर बल देते हुए कहा कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना करने के लिए संवाद, जागरूकता और सहयोग आवश्यक हैं।
मुख्य वक्ता ने मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में मेंटल हेल्थ मिशन इंडिया तथा मनोविज्ञान विभाग, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय द्वारा लगातार किए जा रहे प्रयासों की सराहना की। कार्यक्रम का संचालन मनोविज्ञान विभाग की छात्रा ईशा राजोरिया ने किया। अंत में मेंटल हेल्थ मिशन इंडिया की अध्यक्ष नीतू सैनी ने सभी अतिथियों, वक्ताओं एवं प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम ने मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने, संवाद को प्रोत्साहित करने तथा सहायता प्राप्त करने की प्रवृत्ति को मजबूत बनाने का संदेश दिया।

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