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Sunday, September 27, 2026

विकसित भारत के निर्माण में शिक्षा की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका : डॉ. पंकज मित्तल



ज्ञान सभा मेरठ-2026 में भारतीय ज्ञान परंपरा, कौशल विकास, तकनीक, नैतिकता और राष्ट्र निर्माण पर हुआ मंथन


नित्य संदेश ब्यूरो

मेरठ। शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास (पश्चिमी उत्तर प्रदेश क्षेत्र) द्वारा आयोजित ज्ञान सभा मेरठ-2026 में विकसित भारत के निर्माण में शिक्षा की भूमिका पर व्यापक मंथन किया गया। कार्यक्रम में शिक्षाविदों, विश्वविद्यालयों के कुलपतियों, शिक्षकों, शोधकर्ताओं एवं शिक्षा क्षेत्र से जुड़े प्रतिनिधियों ने भारतीय ज्ञान परंपरा, कौशल विकास, रोजगारपरक शिक्षा, तकनीक, नवाचार, महिला सहभागिता तथा राष्ट्र निर्माण जैसे विषयों पर अपने विचार व्यक्त किए।


चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ एवं शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित ज्ञान सभा 2026 के समापन के अवसर पर मुख्य वक्ता एवं शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. पंकज मित्तल ने कहा कि किसी भी संस्थान के निर्माण के लिए संसाधनों से अधिक अरमान और संकल्प की आवश्यकता होती है। उन्होंने कहा कि केवल आर्थिक दृष्टि से भारत को विकसित मान लेना पर्याप्त नहीं है। विकसित भारत की संकल्पना व्यापक होनी चाहिए, जिसमें भारत आर्थिक रूप से सशक्त होने के साथ-साथ सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, सामाजिक और नैतिक रूप से भी शक्तिशाली बने। उन्होंने कहा कि विकसित भारत के निर्माण में शिक्षा की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। भारत दुनिया के युवा देशों में है और इस युवा शक्ति को सही दिशा देने के लिए भारतीयता से अनुप्रेरित शिक्षा व्यवस्था आवश्यक है। भारतीय ज्ञान परंपरा और इंडियन नॉलेज सिस्टम को प्रत्येक पाठ्यक्रम का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि शिक्षा में केस स्टडी के रूप में केवल विदेशी उदाहरणों पर निर्भर रहने के बजाय भारत में हुए सफल प्रयोगों और परंपरागत ज्ञान के उदाहरणों को भी शामिल किया जाना चाहिए। कुंभ जैसे विशाल आयोजनों में प्रबंधन, तकनीक, सामाजिक समन्वय और सेवा के अनेक ऐसे उदाहरण हैं, जिन्हें विद्यार्थियों के लिए केस स्टडी के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।


डॉ. मित्तल ने कहा कि नई शिक्षा व्यवस्था में कौशलयुक्त एवं रोजगारपरक शिक्षा पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। उद्योगों को शिक्षा व्यवस्था का साझेदार बनाकर उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप पाठ्यक्रम तैयार किए जाने चाहिए, ताकि विद्यार्थियों को शिक्षा के साथ-साथ व्यावहारिक कौशल और रोजगार के अवसर प्राप्त हो सकें। उन्होंने तकनीक और नैतिकता के समन्वय पर बल देते हुए कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी आधुनिक तकनीकों को शिक्षा से जोड़ते हुए विद्यार्थियों को इनके जिम्मेदार एवं नैतिक उपयोग के लिए तैयार करना होगा। उन्होंने नारी शक्ति और समावेशी शिक्षा को भी विकसित भारत की महत्वपूर्ण आवश्यकता बताया। उन्होंने कहा कि समाज के प्रत्येक वर्ग को शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराने तथा महिलाओं की सहभागिता को बढ़ाने पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान प्राप्त करना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों में सेवा भाव उत्पन्न करना भी होना चाहिए। यह सेवा राष्ट्र और समाज के प्रति उत्तरदायित्व की भावना से जुड़ी होनी चाहिए।



कार्यक्रम की अति विशिष्ट अतिथि सविता सेंगर ने कहा कि विकसित भारत की यात्रा निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। यह किसी एक पड़ाव पर समाप्त होने वाली यात्रा नहीं, बल्कि निरंतर परिवर्तन और विकास की यात्रा है। उन्होंने कहा कि शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि व्यक्ति निर्माण की प्रक्रिया है। विकसित भारत के निर्माण में शिक्षा के योगदान को सुनिश्चित करने के लिए शिक्षा व्यवस्था में आवश्यक परिवर्तन लाना होगा। उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति का प्रभावी क्रियान्वयन अभी एक महत्वपूर्ण चुनौती है और इसके लिए शिक्षा व्यवस्था में व्यापक ट्रांसफॉर्मेशन की आवश्यकता है। भारतीय ज्ञान परंपरा को विकास, शोध, नवाचार और कौशल विकास से जोड़कर उसे व्यवहार में उतारने की आवश्यकता है। उन्होंने उद्योगों को शिक्षा व्यवस्था का साझेदार बनाने पर भी बल दिया। उन्होंने कहा कि विकसित भारत का निर्माण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति की इसमें भूमिका है और प्रत्येक नागरिक को अपने स्तर पर योगदान देने के लिए आगे आना चाहिए।


कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ की कुलपति प्रोफेसर संगीता शुक्ला ने कहा कि “ज्ञान सभा से जनसभा तक” केवल एक विषय नहीं, बल्कि एक व्यापक संकल्प और आह्वान है। ज्ञान का अंतिम उद्देश्य केवल ज्ञान प्रदान करना नहीं, बल्कि उसके माध्यम से जनजीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाना है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों से प्राप्त ज्ञान की वास्तविक सफलता तभी मानी जाएगी, जब उसका लाभ समाज और राष्ट्र के जीवन में दिखाई दे। प्रोफेसर संगीता शुक्ला ने कहा कि शिक्षक केवल डिग्री प्राप्त करने का माध्यम नहीं है। शिक्षक की भूमिका राष्ट्र निर्माण में अत्यंत महत्वपूर्ण है और शिक्षा तभी सार्थक होगी, जब वह विद्यार्थियों को समाज और देश के निर्माण में योगदान देने के लिए प्रेरित करे। उन्होंने शिक्षा में राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर की दक्षता विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि किसी भी शोध की सार्थकता तभी है, जब उसके परिणाम समाज या किसी विशेष क्षेत्र की समस्याओं के समाधान में उपयोगी सिद्ध हों। उन्होंने विकसित भारत के निर्माण में महिलाओं की भागीदारी को आवश्यक बताते हुए कहा कि देश के विकास में आधी आबादी की सक्रिय सहभागिता के बिना समग्र विकास की कल्पना नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों को ज्ञान के माध्यम से समाज की सोच और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का कार्य करना चाहिए। शिक्षा का अंतिम उद्देश्य केवल ज्ञान अर्जन नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण और जिम्मेदार नागरिक का निर्माण भी है।



इस अवसर पर शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय सह-संयोजक संजय स्वामी ने वक्ताओं के विचारों को विस्तार देते हुए कहा कि ज्ञान सभा का उद्देश्य शिक्षा को समाज और राष्ट्र की आवश्यकताओं से जोड़ना है। उन्होंने कहा कि भारतीय शिक्षा परंपरा में ज्ञान को जीवन से जोड़कर देखा गया है। आज आवश्यकता है कि आधुनिक शिक्षा, भारतीय ज्ञान परंपरा, कौशल, शोध, नवाचार और सामाजिक उत्तरदायित्व के बीच प्रभावी समन्वय स्थापित किया जाए। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों को केवल डिग्री प्रदान करने वाले केंद्रों के रूप में नहीं, बल्कि ज्ञान, नवाचार, चरित्र निर्माण और राष्ट्र निर्माण के केंद्रों के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। विद्यार्थियों में अपनी संस्कृति और परंपरा के प्रति गौरव के साथ-साथ आधुनिक विज्ञान और तकनीक के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करना आवश्यक है।


ज्ञान सभा में वक्ताओं ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि विकसित भारत का लक्ष्य केवल आर्थिक विकास तक सीमित नहीं है। इसके लिए गुणवत्तापूर्ण एवं भारतीय मूल्यों से युक्त शिक्षा, कौशल विकास, शोध एवं नवाचार, तकनीकी दक्षता, नैतिकता, महिला सहभागिता, सामाजिक समावेशन और राष्ट्र के प्रति सेवा भाव को शिक्षा व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा बनाना होगा। कार्यक्रम में उपस्थित शिक्षाविदों एवं प्रतिभागियों ने इस बात पर सहमति व्यक्त की कि शिक्षा को कक्षा और पाठ्यक्रम की सीमाओं से बाहर निकालकर समाज, उद्योग, शोध संस्थानों और राष्ट्र की आवश्यकताओं से जोड़ना समय की आवश्यकता है। ज्ञान को जनजीवन में परिवर्तन का माध्यम बनाकर ही विकसित भारत की संकल्पना को व्यापक अर्थों में साकार किया जा सकता है।


कार्यक्रम का संचालन प्रोफेसर अनिल मलिक ने किया जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉक्टर वीरेंद्र कुमार तिवारी ने किया। इस अवसर पर प्रोफेसर नीलू जैन गुप्ता प्रोफेसर कृष्णकांत शर्मा प्रोफेसर शिवराज पुंडीर प्रोफेसर विग्नेश कुमार त्यागी प्रोफेसर आराधना गुप्ता डॉ विवेक कुमार डॉक्टर जितेंद्र गोयल डॉक्टर भावना डॉक्टर वैशाली पाटील  डॉक्टर विजेता गौतम प्रेस प्रवक्ता मितेंद्र कुमार गुप्ता सहित विश्वविद्यालय के अनेक शिक्षक अधिकारी व कर्मचारी मौजूद रहे।

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