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Thursday, September 10, 2026

क़ुरआन से गीता तक: इंसानियत, प्रेम और भाईचारे का संदेश


नित्य संदेश। दुनिया में इंसानों के बीच मतभेद हमेशा से रहे हैं। रंग, नस्ल, भाषा, क्षेत्र और धर्म के आधार पर इंसान एक-दूसरे से अलग हैं, लेकिन इन सभी भिन्नताओं के बावजूद एक सच्चाई सबको जोड़ती है और वह है इंसानियत। प्रेम, सहानुभूति, न्याय, सहिष्णुता और एक-दूसरे के दुख-दर्द में सहभागी होना ऐसी मानवीय मूल्य हैं, जिनके बिना कोई भी समाज शांतिपूर्ण और मज़बूत नहीं हो सकता।


आज जब छोटे-छोटे मतभेद भी नफ़रत, भेदभाव और दूरियों को जन्म दे रहे हैं, भाईचारे की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महसूस होती है। भाईचारा केवल एक-दूसरे के साथ अच्छे व्यवहार का नाम नहीं है, बल्कि यह उस भावना का नाम है जिसके तहत इंसान दूसरे इंसान के दुख को अपना दुख और उसकी खुशी को अपनी खुशी समझता है।


क़ुरआन का संदेश-ए-भाईचारा


इस्लाम ने मानवीय भाईचारे और आपसी संबंधों को बहुत महत्व दिया है। क़ुरआन शरीफ़ स्पष्ट रूप से कहता है:


اِنَّمَا الْمُؤْمِنُونَ اِخْوَةٌ


अर्थात—ईमान वाले तो आपस में भाई-भाई हैं।

(सूरह अल-हुजुरात: 10)


क़ुरआन शरीफ़ केवल मुसलमानों के बीच भाईचारे की शिक्षा नहीं देता, बल्कि सभी इंसानों के साथ न्याय और उपकार का आदेश भी देता है। फ़रमाया गया है:


اِنَّ اللّٰهَ يَأْمُرُ بِالْعَدْلِ وَالْاِحْسَانِ


अर्थात—निश्चय ही अल्लाह न्याय और उपकार का आदेश देता है।

(सूरह अन-नहल: 90)


पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद ﷺ ने मुसलमानों के आपसी संबंध को एक मज़बूत शरीर से तुलना करते हुए फ़रमाया कि मुसलमान आपसी प्रेम, दया और सहानुभूति में एक शरीर की तरह हैं; शरीर के किसी एक अंग को तकलीफ़ हो तो पूरा शरीर बेचैनी महसूस करता है। यह शिक्षा सामाजिक जीवन में ज़िम्मेदारी और आपसी सहयोग का पाठ पढ़ाती है।


गीता का संदेश-ए-सहानुभूति


भाईचारे की भावना केवल इस्लामी शिक्षाओं तक सीमित नहीं है। भगवद्गीता में भी दूसरों के सुख और दुख को अपने सुख और दुख की तरह महसूस करने की शिक्षा मिलती है।


गीता के छठे अध्याय के 32वें श्लोक में कहा गया है:


"आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।

सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥"


अर्थात भाव यह है कि—हे अर्जुन! जो व्यक्ति दूसरों को अपने समान समझते हुए उनके सुख और दुख को अपने सुख और दुख की तरह महसूस करता है, वही श्रेष्ठ योगी है।


यह शिक्षा मानवीय सहानुभूति का एक बहुत सुंदर उदाहरण है। यदि हम अपने पड़ोसी के दुख को महसूस करें, किसी गरीब की आवश्यकता को अपनी ज़िम्मेदारी समझें और किसी मुसीबत में पड़े इंसान की सहायता के लिए आगे बढ़ें, तो यही भाईचारे की वास्तविक और व्यावहारिक अभिव्यक्ति है।


"वसुधैव कुटुम्बकम्" — पूरी दुनिया एक परिवार


हिंदू धार्मिक परंपरा में महाउपनिषद का प्रसिद्ध विचार "वसुधैव कुटुम्बकम्" भी मानवीय एकता का सुंदर संदेश प्रस्तुत करता है, जिसका अर्थ है:


"पूरी दुनिया एक परिवार है।"


यह विचार हमें याद दिलाता है कि इंसानियत को नफ़रत और विभाजन के खानों में बाँटने के बजाय एक विशाल मानवीय परिवार के रूप में देखना चाहिए।


इसी प्रकार ऋग्वेद में सामूहिक एकता की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए प्रसिद्ध मंत्र आता है:


"संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्"


अर्थात भाव यह है:


"मिलकर चलो, मिलकर संवाद करो और तुम्हारे दिल और विचार आपस में सामंजस्यपूर्ण हों।"


यह संदेश आज के समाज के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है, जहाँ मतभेदों को अक्सर दुश्मनी में बदल दिया जाता है।


असली परीक्षा व्यावहारिक जीवन में


भाईचारे की वास्तविक कीमत भाषणों में नहीं, बल्कि व्यवहार और कर्म में दिखाई देती है।


यदि किसी मोहल्ले में किसी गरीब परिवार के घर राशन नहीं है और पड़ोसी उसका धर्म या जाति पूछे बिना उसके घर राशन पहुँचा देते हैं, तो यह भाईचारा है।


यदि किसी विद्यार्थी के पास स्कूल की फीस या किताबें खरीदने के पैसे नहीं हैं और मोहल्ले के लोग मिलकर उसकी शिक्षा का प्रबंध करते हैं, तो यह भाईचारा है।


यदि किसी घर में किसी की मृत्यु हो जाए और आसपास के लोग उस परिवार के दुख में शामिल होकर खाने-पीने तथा अन्य आवश्यकताओं की व्यवस्था संभाल लें, तो यह भाईचारा है।


यदि किसी क्षेत्र में बाढ़ आ जाए और मस्जिद का कोई नौजवान अपने हिंदू पड़ोसियों की सहायता के लिए पहुँच जाए, या मंदिर से जुड़े लोग अपने मुस्लिम पड़ोसियों के लिए राहत सामग्री लेकर पहुँचें, तो यह केवल सहायता नहीं, बल्कि ज़िंदा इंसानियत की तस्वीर है।


इसी तरह सोशल मीडिया पर किसी धर्म, जाति या वर्ग के विरुद्ध नफ़रत भरा संदेश देखकर उसे आगे बढ़ाने के बजाय वहीं रोक देना भी आज के दौर में भाईचारे का एक महत्वपूर्ण व्यावहारिक रूप है।


मतभेद रहें, दुश्मनी न बने


भाईचारे का अर्थ यह नहीं है कि सभी लोग अपने विश्वास, विचार और धार्मिक पहचान छोड़ दें। धार्मिक मतभेद अपनी जगह रह सकते हैं, लेकिन मतभेद को नफ़रत, अत्याचार और दुश्मनी में बदलने से रोकना ही सभ्य समाज की पहचान है।


एक मुसलमान अपने विश्वास पर मज़बूती से कायम रहते हुए अपने हिंदू, सिख, ईसाई या किसी भी दूसरे धर्म के पड़ोसी के साथ अच्छा व्यवहार कर सकता है। इसी प्रकार दूसरे धर्मों को मानने वाले लोग भी अपने विश्वास पर कायम रहते हुए अपने मुस्लिम पड़ोसी के सुख-दुख में सहभागी हो सकते हैं।


यही वह व्यवहार है जो भारत जैसे बहुधार्मिक देश को मज़बूत बना सकता है।


आज हमें किस चीज़ की आवश्यकता है?


हमें ऐसे समाज की आवश्यकता है जहाँ मस्जिद और मंदिर की दीवारें अपनी जगह हों, लेकिन इंसानी दिलों के बीच दीवारें न हों; जहाँ धार्मिक पहचान अपनी जगह सम्मानित हो, लेकिन इंसानियत सबके लिए साझा मूल्य हो; जहाँ विचारों में मतभेद हों, लेकिन नफ़रत न हो; जहाँ प्रतिस्पर्धा हो, लेकिन दुश्मनी न हो; और जहाँ मुसीबत के समय इंसान, इंसान के काम आए।


क़ुरआन का "इन्नमल-मोमिनूना इख़्वतुन" हो या गीता में दूसरों के सुख-दुख को अपने सुख-दुख की तरह महसूस करने का संदेश, या उपनिषद का "वसुधैव कुटुम्बकम्" यह सभी हमें अपने-अपने धार्मिक और वैचारिक दायरे में इंसान के प्रति भलाई, सहानुभूति और अच्छे व्यवहार के महत्व का एहसास कराते हैं।


राष्ट्र केवल सड़कों, इमारतों और अर्थव्यवस्था से मज़बूत नहीं होते; राष्ट्र उस समय मज़बूत होते हैं जब उनके दिल एक-दूसरे के लिए धड़कते हैं।


आइए, हम नफ़रत के बजाय प्रेम, भेदभाव के बजाय न्याय, संदेह के बजाय विश्वास और बिखराव के बजाय भाईचारे को बढ़ावा दें।


क्योंकि दिल जुड़ेंगे तो समाज जुड़ेगा,

समाज जुड़ेगा तो देश मज़बूत होगा।


लेखक: महबूब हसन मुज़फ़्फ़रनगरी


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