प्रो. इर्तिज़ा करीम की नई पुस्तक ‘पर्यावरणीय साहित्यिक आलोचना’ का लोकार्पण एवं परिचर्चा
नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। “पुस्तक भी बच्चे की तरह होती है। वह एक दिन में जवान नहीं हो सकती, इसके लिए समय की आवश्यकता होती है। एआई के कारण हमारा पर्यावरण प्रभावित हो रहा है, इस पर विचार करने की आवश्यकता है। पर्यावरणीय आलोचना केवल पर्यावरण की ही आलोचना नहीं है, हमें इसकी गहराई को समझना होगा। नई शिक्षा नीति (NEP) में जिन स्थानीय भाषाओं को अपनाने और स्थानीय बोलियों तथा भाषाओं को पाठ्यक्रम में शामिल करने की बात कही गई है, उसका एक उद्देश्य इन स्थानीय बोलियों और भाषाओं का संरक्षण भी है। यह भी पर्यावरणीय आलोचना का एक हिस्सा है।”
ये विचार प्रसिद्ध आलोचक एवं दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व उर्दू विभागाध्यक्ष प्रो. इर्तिज़ा करीम ने उर्दू विभाग, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ में आयोजित अपनी नई पुस्तक ‘पर्यावरणीय साहित्यिक आलोचना’ के लोकार्पण एवं परिचर्चा कार्यक्रम में व्यक्त किए। उन्होंने आगे कहा कि उनकी यह पुस्तक शीघ्र ही हिंदी में भी प्रकाशित होगी, ताकि अधिक से अधिक लोगों तक यह पुस्तक पहुँच सके। कार्यक्रम का आरंभ मुहम्मद ईसा राना ने पवित्र कुरआन की तिलावत से किया। एम.ए. उर्दू की छात्रा महविश ने नात प्रस्तुत की। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रसिद्ध साहित्यकार एवं आलोचक प्रो. असलम जमशेदपुरी ने की। मुख्य अतिथि के रूप में सुहेल देव विश्वविद्यालय, आज़मगढ़ के पूर्व कुलपति प्रो. पी.के. शर्मा ने सहभागिता की। विशिष्ट अतिथियों के रूप में प्रसिद्ध कथाकार एवं विशिष्ट कवि प्रो. शफ़क़ सोपुरी(कश्मीर), प्रो. ए.के. चौबे (पूर्व अध्यक्ष, प्राणी विज्ञान विभाग) तथा प्रो. कविता त्यागी (अध्यक्ष, हिंदी विभाग, मेरठ कॉलेज) उपस्थित रहीं। स्वागत वक्तव्य डॉ. शादाब अलीम ने दिया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. आसिफ अली ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. अलका वशिष्ठ ने प्रस्तुत किया।
इस अवसर पर विचार व्यक्त करते हुए डॉ. इरशाद स्यानवी ने कहा कि नई सदी में नए विषय पर लिखी गई नई पुस्तक का नाम ‘पर्यावरणीय साहित्यिक आलोचना’ है, जिसे प्रो. इर्तिज़ा करीम ने अत्यंत परिश्रम और लगन के साथ तैयार किया है। नई सदी में पर्यावरण एक महत्वपूर्ण और नया विषय है, जिससे उर्दू जगत अभी अपेक्षाकृत कम परिचित है। हालांकि उर्दू साहित्य में पर्यावरण हमारे साहित्यकारों और कवियों के लिए अपरिचित विषय नहीं रहा है। जब हम उर्दू साहित्य में पर्यावरणीय साहित्यिक आलोचना की बात करते हैं, तो इस विषय पर बहुत अधिक सामग्री उपलब्ध नहीं दिखाई देती। अभी तक पर्यावरणीय साहित्यिक आलोचना पर उर्दू में कोई प्रमाणिक और विश्वसनीय पुस्तक सामने नहीं आई थी। यह उपलब्धि ईश्वर ने प्रो. इर्तिज़ा करीम को प्रदान की, जिन्होंने पर्यावरण को सीधे साहित्यिक आलोचना का विषय बनाया।
प्रो. कविता त्यागी ने कहा कि यह विषय आज भारत के लिए अत्यंत आवश्यक है। जब कोई लेखक लिखता है तो उसकी पुस्तक उसके व्यक्तित्व की छाया होती है। पुस्तक की उपयोगिता को देखते हुए इसका हिंदी और अन्य भाषाओं में भी अनुवाद होना चाहिए, ताकि विभिन्न भाषाओं के पाठकों तक इसका संदेश पहुँच सके। परंपरा से हटकर आज के लेखक ऐसे विषयों को अपनी रचनाओं का आधार बना रहे हैं, जिनकी वर्तमान समाज को अत्यधिक आवश्यकता है। प्रो. ए.के. चौबे ने कहा कि पर्यावरण के संबंध में जो बातें हमारे सामने आ रही हैं, उन पर चर्चा करना अत्यंत आवश्यक है। हमें अपनी सुरक्षा करते हुए विकास की दिशा में भी आगे बढ़ना है। इसलिए आवश्यक है कि हम अपने पर्यावरण को समझें और उसके अनुरूप कार्य करें। आज प्रकृति के साथ जिस प्रकार छेड़छाड़ की जा रही है, उस पर गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है। हमें प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा करनी चाहिए। उन्होंने उत्कृष्ट पुस्तक के लिए प्रो. इर्तिज़ा करीम को बधाई दी।
प्रो. शफ़क़ सोपुरी ने कहा कि अभी तक बहुत से विद्वान पर्यावरणीय आलोचना को पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं। सबसे पहले पर्यावरणीय साहित्य की पहचान आवश्यक है। मेरे विचार से पर्यावरणीय आलोचना की अवधारणा द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सामने आई और उर्दू में यह नया आलोचनात्मक रुझान ‘पर्यावरणीय साहित्यिक आलोचना’ के रूप में सामने आया है। इसका श्रेय प्रो. इर्तिज़ा करीम को जाता है। उनके साहित्य को पढ़कर इस विषय को समझना चाहिए। इर्तिज़ा करीम की आलोचना में सतहीपन नहीं मिलता, उनकी आलोचना का अपना एक स्तर और मानदंड है। ‘पर्यावरणीय साहित्यिक आलोचना’ उर्दू में एक नए आलोचनात्मक बदलाव का सूत्रपात करेगी। मैं स्वयं इस क्षेत्र में आने का बहुत इच्छुक था। सोशल मीडिया पर मैंने उर्दू विभाग की गतिविधियों को देखा है। यह अत्यंत सक्रिय विभाग है। उन्होंने विभाग के सभी सदस्यों को बधाई दी।
प्रो. पी.के. शर्मा ने कहा कि किसी भी पुस्तक का लोकार्पण उसकी महत्ता को बढ़ाने का माध्यम बनता है। ‘पर्यावरणीय साहित्यिक आलोचना’ एक अत्यंत महत्वपूर्ण पुस्तक है। पर्यावरण के बिना हम जीवित नहीं रह सकते। यह विषय अत्यंत उत्कृष्ट और उपयोगी है तथा इस विषय पर विस्तार से चर्चा होनी चाहिए। पर्यावरण हमारे जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है। आज तकनीक का युग है और पुस्तक का अनुवाद करना भी पहले की अपेक्षा बहुत आसान हो गया है। उन्होंने प्रो. इर्तिज़ा करीम से अनुरोध किया कि इस पुस्तक का अन्य भाषाओं में भी अनुवाद कराया जाए, ताकि यह विभिन्न भाषाओं के विद्यार्थियों और शोधार्थियों तक पहुँच सके।
अंत में अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रो. असलम जमशेदपुरी ने कहा कि उर्दू विभाग में अनेक पुस्तकों का लोकार्पण होता रहा है, लेकिन इस पुस्तक का लोकार्पण विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि आज एक नए आलोचनात्मक दृष्टिकोण ‘पर्यावरणीय साहित्यिक आलोचना’ का आरंभ हुआ है। पुस्तक किसी भी विषय पर लिखी जाए, यदि उसका विषय अच्छा और विशिष्ट हो तो ऐसी पुस्तक रचनात्मक पुस्तक से भी अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है। हमें यह देखना होगा कि यह पुस्तक हमें किन-किन दिशाओं की ओर ध्यान आकर्षित करती है। हमारे आसपास की चीजें हमारे साहित्य को भी प्रभावित करती हैं और यह भी पर्यावरणीय साहित्यिक आलोचना का हिस्सा है। इस पुस्तक की एक और विशेषता यह है कि पर्यावरण के विषय पर सभी भाषाओं में चर्चा की जाती है। उन्होंने प्रो. इर्तिज़ा करीम को बधाई देते हुए कहा कि उन्होंने हमें एक नया विषय दिया और आलोचना की एक नई दृष्टि से परिचित कराया।
इस अवसर पर डॉ. इफ़त ज़किया, अनिल शर्मा, हेमंत गोयल, जितेंद्र सी. राज, आफ़ाक़ अहमद ख़ाँ, सिराजुद्दीन अहमद, आबिद सैफ़ी, मुहम्मद नदीम, अरीबा सरफ़राज़, ताहिरा परवीन, नायाब, निमरा, आइका सिद्दीका, सैयदा मरियम इलाही, शाकिर मतलूब सहित अनेक शिक्षक, शोधार्थी एवं छात्र-छात्राएँ उपस्थित रहे।

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