भारत दुनिया का सबसे बड़ा और जीवंत लोकतंत्र है। यहां चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता, पारदर्शिता और विश्वसनीयता बनाए रखने का मुख्य दायित्व भारत निर्वाचन आयोग जैसी शीर्ष संवैधानिक संस्था पर है। हाल के दिनों में एक पुराने समाचार पत्र द्वारा सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत जुटाई गई फाइलों और आंतरिक पत्राचार के आधार पर एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट प्रकाशित की गई। इस रिपोर्ट में दिखाया गया कि चुनाव आयोग और संबंधित निकायों के बीच किसी नीतिगत फैसले तक पहुंचने से पहले 14 बार पत्राचार हुआ और विभिन्न आपत्तियां दर्ज की गईं। हो सकता है कि समाचार पत्र का उद्देश्य यह दर्शाना रहा हो कि गंभीर चिंतन और विचार-विमर्श के बाद ही निष्पक्ष फैसले हुए हैं, लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त की इस स्वाभाविक और आवश्यक प्रशासनिक प्रक्रिया को जिस तरह विपक्षी दलों और काकरोच जनता पार्टी जैसे नए राजनीतिक समूहों द्वारा धांधली या प्रशासनिक संकट के रूप में पेश किया जा रहा है, वह बेहद दुर्भावनापूर्ण और विपक्ष का फैलाया भ्रमजाल ज्यादा है।
इस रिपोर्ट की आड़ लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग करना, देशव्यापी आंदोलन की धमकियां देना और करोड़ों मतदाताओं के नाम गैर-कानूनी ढंग से हटाए जाने के बेबुनियाद आरोप लगाना, सीधे तौर पर देश की संवैधानिक संस्थाओं को नीचा दिखाने और जनता के बीच भ्रमात्मक अराजकता फैलाने की एक सोची-समझी रणनीति ज्यादा लगती है।
किसी भी तीन-सदस्यीय निकाय या बहु-सदस्यीय प्रशासनिक संस्था में नीतिगत निर्णयों, नियमों या फॉर्म-6 जैसे महत्वपूर्ण प्रारूपों में संशोधन पर विचार करते समय सदस्यों के बीच बहस, मतभिन्नता और असहमति होना एक अत्यंत स्वाभाविक, स्वस्थ और लोकतांत्रिक प्रक्रिया है। तभी निर्वाचन आयोग के दोनों आयुक्तों, सुखबीर सिंह संधु और विवेक जोशी ने फॉर्म 6 में बिना नियम बदले किए गए बदलावों पर आपत्ति जताई थी। हालांकि, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ अंततः तीनों आयुक्तों की सर्वसम्मति और हस्ताक्षर से ही यह निर्णय लागू हुआ है।
दो चुनाव आयुक्तों (संधु और जोशी) ने फॉर्म 6 में पूर्वजों के वोटर लिस्ट रिकॉर्ड से जुड़े नए सवाल को अवैध बताते हुए लिखित विरोध दर्ज कराया था। इस आंतरिक मतभेद के बावजूद, आयोग के नियमानुसार अंतिम फैसला तो तीनों आयुक्तों (ज्ञानेश कुमार, सुखबीर संधु और विवेक जोशी) की आपसी सहमति और हस्ताक्षर से ही पारित किया गया है।
भारत का निर्वाचन आयोग एक स्वायत्त निकाय है, जहां हर आयुक्त को अपनी स्वतंत्र राय व्यक्त करने का पूरा अधिकार है। जब किसी मसौदे पर विचार होता है, तो उससे जुड़ी आपत्तियां, सुझाव और समीक्षाएं लिखित रूप में दर्ज कराया जाना अनिवार्य हो जाता है, क्योंकि देश से जुड़ा निर्णय हर पहलू से सोच-समझकर ही लिया जाता है।
आपत्ति जताने का अर्थ यह नहीं कि यह किसी गड़बड़ी, नियम-विरुद्ध आचरण या धांधली का प्रमाण है, बल्कि यह इस बात का ठोस सबूत है कि आयोग के भीतर कोई भी फैसला तानाशाही या एकतरफा रवैये से नहीं, बल्कि गहन मंथन, समीक्षा और पारदर्शी लोकतांत्रिक तरीके से लिया जा रहा है।
प्रशासनिक और कानूनी व्यवस्था में असहमति या संदेह को लिखित में दर्ज कराना एक मानक संचालन प्रक्रिया का हिस्सा है। आरटीआई की रिपोर्ट केवल यह दर्शाती है कि निर्णय लेने की प्रक्रिया के दौरान किन-किन चरणों पर विचार-विमर्श और आपत्तियां हुई थीं। आयोग पहले ही यह स्पष्ट कर चुका है कि आंतरिक विचार-विमर्श और सवाल-जवाब के बाद जो अंतिम फैसले लागू किए गए, वे तीनों आयुक्तों की सर्वसम्मति से और कानून के दायरे में रहकर ही लिए गए हैं। इसलिए फाइल की आंतरिक बहसों को किसी बड़े प्रशासनिक संकट के रूप में पेश करना पूरी तरह से तथ्यहीन, भ्रामक और तर्कहीन है।
बिना किसी ठोस वैधानिक साक्ष्य के, पूरे विपक्ष और सीजेपी का सड़क पर उतरकर व्यवस्था को ठप करने की धमकी देना, चुनाव सुधार की नीयत को नहीं बल्कि उनके राजनीतिक स्वार्थ को दर्शाता है।
यदि किसी प्रक्रिया या निर्णय में कोई वास्तविक त्रुटि थी, तो उसके लिए देश में संवैधानिक और कानूनी रास्ते हमेशा मौजूद हैं। कोर्ट जाने या साक्ष्यों के साथ आयोग के समक्ष अपनी बात रखने के बजाय जनमानस में चुनावी प्रक्रिया के प्रति अविश्वास पैदा करना लोकतंत्र को मजबूत करने के बजाय उसे कमजोर करता है।
विपक्ष द्वारा अपनी राजनीतिक असफलताओं का ठीकरा बार-बार संवैधानिक संस्थाओं पर फोड़ने से प्रशासनिक तंत्र का मनोबल गिरता है और आम नागरिकों के मन में लोकतांत्रिक ढांचे के प्रति संशय पैदा होता है। चुनाव आयोग की बहु-सदस्यीय कार्यप्रणाली, उसकी स्वायत्तता और नियमानुसार लिए गए निर्णयों पर भरोसा रखना ही एक परिपक्व लोकतंत्र की पहचान है। प्रक्रियात्मक बहस को साजिश का रूप देकर देश में अस्थिरता, अशांति और अराजकता का माहौल बनाने की मंशा किसी भी सूरत में तर्कसंगत नहीं ठहराई जा सकती।
उस समाचार पत्र की रिपोर्ट और चुनाव आयोग का रुख वास्तव में एक ही प्रक्रिया के दो अलग-अलग पहलुओं को रेखांकित करते हैं। जहां एक तरफ रिपोर्ट यह दिखाती है कि निर्णय तक पहुंचने के सफर में कितनी आपत्तियां और पत्राचार हुए, वहीं आयोग का स्पष्टीकरण यह साबित करता है कि वे सभी आपत्तियां केवल आंतरिक विचार-विमर्श का हिस्सा थीं और अंतिम निर्णय पूर्णतः पारदर्शी, कानूनी और सामूहिक सहमति से लिया गया था। अतः प्रक्रियात्मक संवाद पर भ्रामक प्रचार करना विपक्ष की बहुत बड़ी भूल है।
समाचार संपादक, नित्य संदेश


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