यमुनाजी शुद्धिकरण के संकल्प के साथ तीन दिवसीय कथा का भावपूर्ण समापन
नवीन मौर्य
नित्य संदेश, इंदौर। श्री यमुनाजी के शुद्धिकरण के पवित्र संकल्प के साथ इंदौर में आयोजित तीन दिवसीय आध्यात्मिक आयोजन का रविवार को भावपूर्ण समापन हुआ। अंतरराष्ट्रीय पुष्टिमार्गीय वैष्णव परिषद–इंदौर शाखा के तत्वावधान में 11 से 13 सितंबर तक रवीन्द्र नाट्यगृह में आयोजित ‘श्रीनाथजी चरित्रामृत रसपान कथा’ के अंतिम दिन भक्ति, संगीत और अध्यात्म का अद्भुत संगम देखने को मिला। कड़ी-अहमदाबाद से पधारे वैष्णवाचार्य 108 श्री यदुनाथजी महाराज के मुखारविंद से प्रवाहित संगीतमय कथा का रसपान करने बड़ी संख्या में वैष्णवजन उमड़े।
कथा के तीसरे दिन श्रीनाथजी की ब्रज से मेवाड़ तक की दिव्य यात्रा का प्रसंग सुनाते हुए वैष्णवाचार्य श्री यदुनाथजी महाराज ने कहा कि गोवर्धन स्थित जतिपुरा, ब्रजधाम से श्रीनाथजी मेवाड़ तक पहुंचे और इस यात्रा में दो वर्ष चार माह का समय लगा। श्रीनाथजी की यह यात्रा केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक की यात्रा नहीं थी, बल्कि भक्त और भगवान के बीच अटूट प्रेम, श्रद्धा और समर्पण की अनुपम यात्रा थी।
उन्होंने बताया कि श्रीनाथजी जहां-जहां रुके, वे स्थान आज ‘चरण चौकी’ के नाम से जाने जाते हैं। इन स्थानों से भगवान के प्रवास की स्मृतियां और भक्तिभाव आज भी जुड़े हुए हैं। कथा के दौरान जब श्रीनाथजी के ब्रज से मेवाड़ पधारने का प्रसंग आया तो सभागृह में उपस्थित वैष्णवजन भावविभोर हो उठे।
‘जीवों की कृपा से श्रीनाथजी मेवाड़ पधारे’। श्री यदुनाथजी महाराज ने कहा कि श्रीनाथजी का मेवाड़ पधारना अपने आप में भगवान की विशेष कृपा का प्रसंग है। जीवों की कृपा से श्रीनाथजी मेवाड़ पधारे। भगवान का यह प्रवास केवल ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि पुष्टिमार्गीय परंपरा में भक्ति, शरणागति और प्रभु-कृपा का जीवंत प्रतीक है।
उन्होंने श्रीनाथजी के चरित्र से जुड़े प्रसंगों को संगीत और भावपूर्ण कथन के साथ प्रस्तुत करते हुए श्रद्धालुओं को भगवान के स्वरूप, उनकी लीला तथा पुष्टिमार्गीय भक्ति की गहराई से परिचित कराया। कथा के दौरान जब-जब श्रीनाथजी की ब्रजभूमि, गोवर्धन और मेवाड़ यात्रा के प्रसंग आए, पूरा सभागृह ‘श्रीनाथजी प्रभु’ के जयघोष और भक्ति भाव से गूंज उठा।
कथा में भक्ति के साथ यमुनाजी शुद्धिकरण का संदेश
तीन दिवसीय आयोजन का प्रमुख उद्देश्य श्री यमुनाजी के शुद्धिकरण का संकल्प जन-जन तक पहुंचाना भी रहा। कथा के माध्यम से श्रद्धालुओं को यह संदेश दिया गया कि यमुनाजी केवल एक नदी नहीं, बल्कि सनातन आस्था, भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं और वैष्णव भक्ति की साक्षात धारा हैं। इसलिए यमुनाजी की निर्मलता और पवित्रता बनाए रखना प्रत्येक श्रद्धालु का दायित्व है। तीनों दिनों तक रवीन्द्र नाट्यगृह में आध्यात्मिक वातावरण बना रहा। कथा, संगीत और भक्ति के सुंदर समन्वय ने उपस्थित वैष्णवजनों को श्रीनाथजी की लीलाओं से जोड़े रखा। अंतिम दिन कथा पूर्ण होने पर श्रद्धालुओं ने आयोजन को प्रभु-कृपा का अनुपम अवसर बताते हुए आयोजकों के प्रति आभार व्यक्त किया।
परिषद के अध्यक्ष गाेपालदास नागर व सचिव ब्रजेशभाई तलाटीने व्यासपीठ और आचार्यश्री काे पुष्पमाला समर्पित की।




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