चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में ‘रुबाई का फ़न और दक्षिण भारत की रुबाई’ विषय पर ऑनलाइन कार्यक्रम का आयोजन
नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। रुबाई एक ऐसी विधा है, जिसकी प्रत्येक पंक्ति में एक दृष्टि होती है। अमीर ख़ुसरो के यहाँ फ़ारसी रुबाइयाँ मिलती हैं। सबसे पहली रुबाई हज़रत गेसूदराज की मानी जाती है। हज़रत गेसूदराज का जन्म 1312 ई. में दिल्ली में हुआ था। वे 80 वर्ष की आयु में गुलबर्गा आए और 105 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ। सूफ़ी दर्शन और नैतिकता के क्षेत्र में उनका नाम अत्यंत महत्वपूर्ण है, किंतु उनके साथ न्याय नहीं किया गया। ये विचार कनाडा के प्रसिद्ध शोधकर्ता एवं आलोचक डॉ. तकी आबिदी ने आयुसा, उर्दू विभाग, ख़्वाजा बंदा नवाज़ विश्वविद्यालय, गुलबर्गा तथा उर्दू विभाग, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ‘रुबाई का फ़न और दक्षिण भारत की रुबाई’ विषयक ऑनलाइन कार्यक्रम में व्यक्त किए।
उन्होंने आगे कहा कि रुबाई के क्षेत्र में अमजद हैदराबादी का भी महत्वपूर्ण स्थान है। दक्षिण भारत की रुबाइयों में अमजद हैदराबादी को विशिष्ट स्थान प्राप्त है। उनकी गद्य-रचनाएँ भी अत्यंत प्रभावशाली थीं। रुबाई दक्खिन की उपज है और उर्दू में पहली रुबाई ख़्वाजा बंदा नवाज़ गेसूदराज की मानी जाती है। इससे पूर्व कार्यक्रम का शुभारंभ सईद अहमद सहारनपुरी ने पवित्र कुरआन के पाठ से किया। डॉ. शहबाज़ अरशद (गुलबर्गा विश्वविद्यालय) ने नात प्रस्तुत की। कार्यक्रम की अध्यक्षता एवं संरक्षण प्रसिद्ध आलोचक एवं कहानीकार तथा उर्दू विभागाध्यक्ष प्रो. असलम जमशेदपुरी और अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शोधकर्ता एवं आलोचक डॉ. तकी आबिदी (कनाडा) ने किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रसिद्ध साहित्यकार एवं आलोचक प्रो. सगीर अफ़राहीम ने की।
मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. तैयब ख़रादी, अध्यक्ष, उर्दू विभाग, द न्यू कॉलेज, चेन्नई तथा विशिष्ट अतिथियों के रूप में डॉ. अथर मुअज़्ज़मुद्दीन और डॉ. ममूना सरडगी, सहायक प्रोफेसर, उर्दू विभाग, ख़्वाजा बंदा नवाज़ विश्वविद्यालय, गुलबर्गा ने सहभागिता की। कार्यक्रम से लखनऊ से ईवसा की अध्यक्ष प्रो. रेशमा परवीन भी जुड़ी रहीं। स्वागत भाषण मुहम्मद आबिद अली ने दिया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. अतीउल्लाह, सहायक प्रोफेसर, उर्दू विभाग, ख़्वाजा बंदा नवाज़ विश्वविद्यालय, गुलबर्गा ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. सलमान अब्दुस्समद, सहायक प्रोफेसर, उर्दू विभाग, ख़्वाजा बंदा नवाज़ विश्वविद्यालय, गुलबर्गा ने प्रस्तुत किया।
इस अवसर पर प्रसिद्ध साहित्यकार एवं आलोचक प्रो. असलम जमशेदपुरी ने कहा कि हम इस साहित्यिक गतिविधि को, इंशाअल्लाह, आगे भी जारी रखेंगे। आज का यह कार्यक्रम उर्दू विभाग, ख़्वाजा बंदा नवाज़ विश्वविद्यालय, गुलबर्गा के सहयोग से आयोजित किया जा रहा है। आज के कार्यक्रम से अनेक लोग जुड़े हुए हैं, जिनका हम स्वागत एवं आभार व्यक्त करते हैं। डॉ. अथर मुअज़ ने अपना शोध-पत्र प्रस्तुत करते हुए कहा कि कर्नाटक में रुबाई के संबंध में निश्चित रूप से बहुत अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। स्वतंत्रता से पूर्व कर्नाटक में विशेष रूप से कविता और शायरी का लेखन होता रहा है, लेकिन रुबाई के संबंध में विशेष जानकारी प्राप्त नहीं होती। हालांकि हैदराबाद में रुबाइयाँ लिखने वाले अनेक कवि हुए हैं। बरकतुल्लाह और हक़राही क़ुरैशी की रुबाइयों में समाज और जीवन की विभिन्न समस्याओं एवं विषयों के साथ-साथ उर्दू भाषा के महत्व पर भी बल दिया गया है। अनेक रुबाइयाँ हिंदी और संस्कृत से अनूदित हैं। ख़ालिद सईद, अक़रम नक़्क़ाश, अमजद हुसैन कर्नाटकी और हाफ़िज़ कर्नाटकी की रुबाइयाँ जनसाधारण के बीच लोकप्रिय होने के साथ-साथ बच्चों की सोच-विचार, सभ्यता और संस्कृति के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। दक्षिण भारत, विशेष रूप से कर्नाटक में रुबाइयों का लेखन निरंतर हो रहा है।
मुख्य अतिथि डॉ. तैयब ख़रादी ने कहा कि मुहम्मद क़ुली क़ुतुब शाह ने रुबाइयों में विशेष रूप से अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। तमिलनाडु, कर्नाटक और मद्रास आदि क्षेत्रों में अनेक सूफ़ी कवि हुए हैं। तमिलनाडु में बाक़र आगा बल्लूरी ने काव्य की लगभग प्रत्येक विधा में अपनी प्रतिभा का परिचय दिया, विशेष रूप से रुबाइयों में उनकी गहरी रुचि थी। बाक़र आगा की रुबाइयों की भाषा परिष्कृत तथा अभिव्यक्ति अत्यंत सहज है। उनकी भाषा हिंदी, अरबी और फ़ारसी के प्रभाव से समृद्ध होने के साथ-साथ स्वच्छ एवं प्रभावशाली है। राही मद्रासी, ईमान वफ़ा, अलीम सबा नवैदी और अश्जर बल्लूरी आदि ने भी सुंदर रुबाइयाँ लिखी हैं।
डॉ. ममूना सरडगी ने अपना शोध-पत्र प्रस्तुत करते हुए कहा कि दक्खिन की धरती सदियों से कविता और साहित्य के क्षेत्र में अत्यंत उर्वर रही है। उर्दू की अन्य साहित्यिक विधाओं की तरह रुबाई के क्षेत्र में भी यहाँ विशेष रूप से रचनात्मक प्रयोग किए गए हैं। आयुसा की अध्यक्षा प्रो. रेशमा परवीन ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि सभी वक्ताओं ने उत्कृष्ट शोध-पत्र प्रस्तुत किए और रुबाई की पूरी पृष्ठभूमि सामने आ गई। कम समय में हमें रुबाई के संबंध में पर्याप्त जानकारी प्राप्त हुई। जब रुबाइयों की बात होती है तो हमें मीर अनीस की याद आती है। अमजद हैदराबादी ने भी उत्कृष्ट रुबाइयों की रचना की है।
अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रो. सगीर अफ़राहीम ने कहा कि पूरे भारत में बीसवीं शताब्दी के महत्वपूर्ण नामों में अमजद हैदराबादी का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। दक्खिनी मरसिये में रुबाई का विशेष समावेश दिखाई देता है। मीर और उनके समकालीन शायरों ने भी रुबाई पर विशेष ध्यान दिया। दक्षिण भारत की ओर हमारा ध्यान विशेष रूप से जाता है। अमजद ने बचपन से ही रुबाइयाँ लिखनी प्रारंभ कर दी थीं। किसी भी विषय को समझने के लिए गंभीरता आवश्यक है और यह गंभीरता रुबाई में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। भारतीय संस्कृति और सभ्यता की आत्मा में जो सम्मान और गहराई है, वह रुबाई की ओर संकेत करती है। तमिलनाडु में रुबाई पर उल्लेखनीय और व्यापक कार्य हुआ है।
कार्यक्रम से डॉ. आसिफ़ अली, डॉ. शादाब अलीम, डॉ. इरशाद सियानवी, डॉ. अलका वशिष्ठ, सैयदा मरियम इलाही, फ़रहत अख़्तर, मुहम्मद शमशाद सहित अनेक शोधार्थी, विद्यार्थी एवं छात्राएँ जुड़े रहे।

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