IIU Global के अंतरराष्ट्रीय वर्चुअल सम्मेलन में भारतीय ज्ञान परंपरा, पर्यावरण कानून और वैश्विक जलवायु उत्तरदायित्व पर किया विमर्श
नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। अंतर्राष्ट्रीय इंटर्नशिप विश्वविद्यालय (IIU Global) द्वारा आयोजित IIU Africa Training के अंतर्गत वर्चुअल अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के विधि अध्ययन संस्थान (Department of Legal Studies) के विभागाध्यक्ष एवं एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. विवेक कुमार त्यागी ने मुख्य वक्ता के रूप में प्रतिभाग किया। सम्मेलन का विषय “Human Impacts & Responsibility on Climate Change” था। कार्यक्रम की अध्यक्षता IIU के कुलपति Snr. Prof. General Charles Usiholo Ebhoria ने की। डॉ. विवेक कुमार त्यागी ने अपने व्याख्यान में भारतीय ज्ञान परंपरा (Indian Knowledge System-IKS), पर्यावरण कानून और जलवायु नैतिकता के समन्वय पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि वर्तमान जलवायु संकट केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि मानवीय उत्तरदायित्व और नैतिकता से जुड़ा वैश्विक विषय है।
जलवायु संकट के लिए मानवीय उत्तरदायित्व आवश्यक
डॉ. त्यागी ने वैश्विक तापमान में लगभग 1.45°C की वृद्धि तथा वायुमंडल में 413+ ppm CO₂ सांद्रता का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्तमान जलवायु संकट मुख्यतः मानवीय गतिविधियों से उत्पन्न हुआ है। ऐसे में जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए केवल तकनीकी और नीतिगत उपाय पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि मानव व्यवहार में नैतिक परिवर्तन भी आवश्यक है।
भारतीय दर्शन में प्रकृति संरक्षण का नैतिक आधार
उन्होंने अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त के प्रसिद्ध वाक्य “माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः” का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में पृथ्वी को माता और मानव को उसका पुत्र माना गया है। इसी प्रकार “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना संपूर्ण विश्व को एक परिवार के रूप में देखने की प्रेरणा देती है। भारतीय दर्शन में प्रकृति संरक्षण केवल कानून अथवा नीति का विषय नहीं, बल्कि मानव का नैतिक कर्तव्य है।
भारतीय संविधान में पर्यावरण संरक्षण की स्पष्ट व्यवस्था
डॉ. त्यागी ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21, अनुच्छेद 48A तथा अनुच्छेद 51A(g) का उल्लेख करते हुए बताया कि भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में स्वच्छ एवं स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार तथा पर्यावरण संरक्षण के प्रति राज्य एवं नागरिकों के दायित्वों को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।
‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और ‘Ubuntu’ का वैश्विक संगम
व्याख्यान के दौरान डॉ. त्यागी ने भारतीय दर्शन के ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और अफ्रीकी दर्शन के ‘Ubuntu – I am because we are’ के बीच नैतिक समानता को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि दोनों विचारधाराएं सामूहिक उत्तरदायित्व, परस्पर सहयोग और मानव-समाज की एक-दूसरे पर निर्भरता को स्वीकार करती हैं। यह दृष्टिकोण विकासशील देशों के लिए न्यायसंगत एवं समावेशी जलवायु रणनीति तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
परंपरागत ज्ञान और गांधीवादी विचारों से आधुनिक समाधान
डॉ. त्यागी ने भारत की पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियों जैसे बावड़ी और जोहड़, पवित्र उपवनों (Sacred Groves) तथा स्थानीय पारिस्थितिकी आधारित ज्ञान का उल्लेख करते हुए इनके संरक्षण और पुनर्जीवन की आवश्यकता बताई। उन्होंने महात्मा गांधी के ‘अपरिग्रह’ एवं ‘ट्रस्टीशिप’ के सिद्धांतों को आधुनिक Mission LiFE तथा UN Sustainable Development Goals (SDGs) से जोड़ते हुए कहा कि भारतीय परंपरागत ज्ञान आधुनिक सतत विकास के लिए महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान कर सकता है।
व्याख्यान के समापन पर डॉ. विवेक कुमार त्यागी ने भारतीय ज्ञान परंपरा के नैतिक सिद्धांतों को पर्यावरण कानून, नीति-निर्माण तथा वैश्विक जलवायु कूटनीति में समाहित करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन की चुनौती का प्रभावी समाधान तभी संभव है, जब आधुनिक विज्ञान एवं कानून के साथ-साथ स्थानीय ज्ञान, नैतिक मूल्यों और सामूहिक वैश्विक उत्तरदायित्व को भी समान महत्व दिया जाए। कार्यक्रम में विभिन्न देशों के शिक्षाविदों, विशेषज्ञों एवं प्रतिभागियों ने सहभागिता की और जलवायु परिवर्तन, पर्यावरणीय उत्तरदायित्व तथा सतत विकास से जुड़े विषयों पर विचार-विमर्श किया।

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