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Saturday, August 8, 2026

जिस दिन माँ ने साथ छोड़ा, उसी दिन मिला जीवन का सबसे बड़ा संस्कार: विनीत शारदा

 


नित्य संदेश ब्यूरो

मेरठ। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं भाजपा व्यापार प्रकोष्ठ के प्रदेश संयोजक विनीत अग्रवाल शारदा ने अपने जन्मदिन को एक भावुक और प्रेरणादायी सेवा-दिवस में बदल दिया। 8 अगस्त 2024 को जिस दिन उनकी पूज्य माताजी स्वर्गीय संतोष रानी गोयल गोलोकवासी हुईं, उसी दिन उनका जन्मदिन भी था। तब से यह तारीख उनके लिए उत्सव से अधिक, माँ के संस्कारों को जीने का संकल्प बन गई है।

 

अपनी माताजी की द्वितीय पुण्यतिथि और अपने जन्मदिन के अवसर पर विनीत शारदा आज सपरिवार लोहिया नगर, हापुड़ रोड स्थित बृजमोहन ब्लाइंड स्कूल पहुंचे। यहाँ उन्होंने दृष्टिबाधित एवं जरूरतमंद बच्चों को अपने हाथों से भोजन कराया, फल, मिष्ठान वितरित किए और वस्त्र भेंट किए। इसके बाद परिवार ने अनाथ आश्रम और गौशाला पहुंचकर भी सेवा कार्य किए। इस सेवा कार्य में उनकी पत्नी संगीता अग्रवाल शारदा, भाई विपीन अग्रवाल शारदा, छोटे भाई उमेश अग्रवाल शारदा एवं उनकी पत्नी अंजली अग्रवाल, पुत्र चिराग अग्रवाल शारदा एवं पुत्रवधू सुहानी अग्रवाल, बहन योगिता अग्रवाल, बहनोई संजय अग्रवाल, बेटे गोविंद अग्रवाल, माधव अग्रवाल, बिटिया आशी और राधिका एवं गौरव जी सहित परिवार के अन्य सदस्य मौजूद रहे।

 

भावुक हुए विनीत शारदा -

इस अवसर पर विनीत शारदा ने भावुक होते हुए कहा, "पहले मेरा जन्मदिन बड़े उत्साह से मनाया जाता था, लेकिन 8 अगस्त 2024 ने मेरे जीवन की खुशियों का अर्थ ही बदल दिया। उसी दिन मेरी माँ मुझे छोड़कर चली गईं। माँ की कमी कोई पूरी नहीं कर सकता, लेकिन उनके दिए संस्कारों को जीकर उनकी ममता को समाज तक पहुँचाया जा सकता है। इसलिए मैंने तय किया कि अपना जन्मदिन ऐसे बच्चों के बीच मनाऊँगा, जिन्हें प्रेम और सहारे की सबसे ज्यादा जरूरत है।" उन्होंने कहा, "आज जब इन बच्चों को भोजन कराया तो लगा जैसे माँ कह रही हों कि जन्मदिन पर अपने लिए नहीं, किसी और के लिए खुशियाँ लेकर जाओ।"

 


विनीत शारदा ने बताया कि उनकी माताजी धर्मपरायण, सेवाभावी और सनातन संस्कृति में गहरी आस्था रखने वाली थीं और पूज्य कृपालु जी महाराज को अपना गुरुदेव मानती थीं। उन्होंने कहा, "सनातन धर्म केवल मंदिर में दीप जलाना नहीं सिखाता, बल्कि उस चेहरे पर मुस्कान लाना भी सिखाता है जहाँ जीवन ने अंधेरा कर दिया हो। भूखे को भोजन, जरूरतमंद को वस्त्र, अनाथ को अपनापन और गौसेवा ही हमारी संस्कृति का जीवंत स्वरूप है।" अंत में उन्होंने प्रार्थना की कि भगवान उनकी माताजी को अपने श्रीचरणों में स्थान दें और परिवार को उनके बताए धर्म, सेवा और संस्कार के मार्ग पर चलने की शक्ति प्रदान करें। परिवार ने भी संकल्प लिया कि माँ के संस्कारों को सेवा के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाया जाएगा।

 

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