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Thursday, July 23, 2026

​नारे नहीं, राष्ट्र चाहिए : NEET विवाद और व्यवस्था परिवर्तन का समय

नित्य संदेश

​किसी भी राष्ट्र का भविष्य संसदों में जितना तय होता है, उससे कहीं अधिक उन परीक्षा-कक्षों में निर्धारित होता है, जहाँ करोड़ों युवा अपने श्रम, संयम और स्वप्नों के साथ बैठते हैं। वहाँ केवल प्रश्नपत्र नहीं खुलते, वहाँ भविष्य के चिकित्सक, वैज्ञानिक, शिक्षक और राष्ट्रनिर्माता आकार लेते हैं। इसलिए जब किसी राष्ट्रीय परीक्षा की पवित्रता पर प्रश्न उठता है, तब आहत केवल एक परीक्षा नहीं होती, घायल राष्ट्र का विश्वास होता है।

​भारत की संस्कृति ने ज्ञान को कभी व्यापार नहीं माना। हमारे यहाँ विद्या को "सरस्वती" कहा गया, क्योंकि वह केवल जीविका का साधन नहीं, जीवन का संस्कार है। नालंदा और तक्षशिला की परंपरा से लेकर आधुनिक भारत की प्रतियोगी परीक्षाओं तक एक सूत्र निरंतर दिखाई देता है—प्रतिभा का सम्मान। यदि यह सूत्र टूटता है, तो केवल व्यवस्था नहीं टूटती, समाज का नैतिक संतुलन भी डगमगा जाता है। NEET विवाद इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए।

​स्वाभाविक है कि जब लाखों विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़ी परीक्षा पर प्रश्न उठे, तब समाज में आक्रोश उत्पन्न हो। लोकतंत्र में यह आक्रोश अस्वाभाविक नहीं, बल्कि जनचेतना का परिचायक है। किंतु भारत की सभ्यता ने हमें एक और शिक्षा दी है—निर्णय से पहले तथ्य, प्रतिक्रिया से पहले विवेक और संघर्ष से पहले आत्ममंथन।

​प्रश्न यह नहीं कि विरोध क्यों हुआ। प्रश्न यह है कि विरोध का अंतिम लक्ष्य क्या है? यदि उद्देश्य दोषियों को दंड दिलाना है, तो पूरा राष्ट्र एक स्वर में उसके साथ खड़ा होगा। यदि उद्देश्य परीक्षा व्यवस्था को अधिक सुरक्षित बनाना है, तो यह प्रत्येक विद्यार्थी का अधिकार है। यदि उद्देश्य ऐसी तकनीकी व्यवस्था विकसित करना है जिसमें संगठित पेपर लीक लगभग असंभव हो जाए, तो उसका स्वागत होना चाहिए। किंतु यदि विमर्श केवल व्यक्तियों के इर्द-गिर्द सिमट जाए और व्यवस्था परिवर्तन पीछे छूट जाए, तो हम मूल समस्या से दूर चले जाएँगे।

​इतिहास हमें सिखाता है कि सभ्यताएँ व्यक्ति-पूजा से नहीं, संस्थाओं की मजबूती से आगे बढ़ती हैं। सम्राट बदलते रहे, राजवंश बदलते रहे, पर हिंदुस्थान इसलिए जीवित रहा क्योंकि उसकी आत्मा संस्थाओं, मूल्यों और समाज की चेतना में बसती रही। आज भी यही कसौटी है।

​पेपर लीक कोई आकस्मिक घटना नहीं है। वर्षों से देश के विभिन्न हिस्सों में भर्ती परीक्षाओं और प्रवेश परीक्षाओं को लेकर अनियमितताओं की खबरें सामने आती रही हैं। इससे स्पष्ट है कि समस्या किसी एक परीक्षा या एक सरकार तक सीमित नहीं है। यह उस विकृत मानसिकता का परिणाम है, जिसने शिक्षा को साधना के स्थान पर सौदे का माध्यम बना दिया। जहाँ प्रतिभा बिकने लगे और परिश्रम हारने लगे, वहाँ केवल छात्र नहीं हारते, राष्ट्र हारता है।

​इसीलिए आवश्यकता किसी एक व्यक्ति को कटघरे में खड़ा करने से अधिक उस पूरे तंत्र को समाप्त करने की है, जो ईमानदार युवाओं के सपनों पर आघात करता है। यदि जांच में कोई अधिकारी, कर्मचारी, दलाल, कोचिंग संचालक या अन्य व्यक्ति दोषी सिद्ध होता है, तो उसके विरुद्ध कानून का सबसे कठोर प्रावधान लागू होना चाहिए। न्याय का धर्म व्यक्ति नहीं, अपराध देखता है।

​आज भारत अमृतकाल की यात्रा पर है। विकसित भारत का स्वप्न केवल राजमार्गों, डिजिटल अर्थव्यवस्था और अंतरिक्ष अभियानों से पूरा नहीं होगा। वह तभी साकार होगा जब देश का प्रत्येक युवा यह विश्वास कर सके कि उसकी सफलता का एकमात्र आधार उसकी प्रतिभा और परिश्रम है। यही विश्वास किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूँजी होता है।

​इस संदर्भ में परीक्षा प्रणाली में तकनीकी सुधारों पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। सुरक्षित डिजिटल प्रणाली, आधुनिक एन्क्रिप्शन, पारदर्शी निगरानी और आवश्यकता के अनुसार कंप्यूटर आधारित परीक्षाएँ भविष्य की दिशा बन सकती हैं। तकनीक कोई जादू नहीं करती, किंतु वह भ्रष्टाचार के अवसरों को सीमित अवश्य करती है। यदि व्यवस्था अधिक सुरक्षित बनती है, तो उसका लाभ किसी सरकार को नहीं, बल्कि उन करोड़ों युवाओं को मिलेगा जो अपने भविष्य के लिए दिन-रात परिश्रम कर रहे हैं।

​दुर्भाग्य से हमारे समय का सार्वजनिक विमर्श कई बार मूल प्रश्नों को छोड़कर प्रतीकों और नारों में उलझ जाता है। सोशल मीडिया का शोर कभी-कभी तथ्यों की आवाज़ को दबा देता है। किंतु राष्ट्र का निर्माण ट्रेंड से नहीं, सत्य से होता है। क्षणिक उत्तेजना इतिहास नहीं लिखती, इतिहास वही लिखता है जो व्यवस्था को बदलने का साहस करता है।

​यह भी स्मरण रखना होगा कि विद्यार्थी किसी राजनीतिक संघर्ष के उपकरण नहीं हैं। उनका आक्रोश वास्तविक है, उनकी चिंता भी वास्तविक है। इसलिए उनके भविष्य की रक्षा करना सभी राजनीतिक दलों, सरकारों, शैक्षणिक संस्थानों और समाज की साझा जिम्मेदारी है।

​वर्तमान में हमने देखा कि पिछले 20 दिनों के दौरान इस आंदोलन में अनेक राजनीतिक तत्वों के साथ-साथ विभिन्न अन्य समूह भी लगातार शामिल होते गए। यह स्थिति देश की स्थिरता और सुरक्षा के लिए चिंता का विषय है। विश्व के अनेक देशों में भी ऐसे उदाहरण देखने को मिले हैं, जहाँ किसी आंदोलन की शुरुआत एक उद्देश्य के साथ हुई, लेकिन समय के साथ उसका स्वरूप बदल गया। परिणामस्वरूप कई स्थानों पर अराजकता फैली, सामाजिक अस्थिरता बढ़ी और राष्ट्र के हितों को गंभीर क्षति पहुँची। इसलिए आवश्यक है कि किसी भी आंदोलन को उसके मूल उद्देश्य तक सीमित रखा जाए तथा यह सुनिश्चित किया जाए कि उसमें ऐसे तत्व शामिल न हों जो देश की शांति, कानून-व्यवस्था और राष्ट्रीय एकता को प्रभावित करें।

​लोकतंत्र में असहमति का सम्मान होना चाहिए, परंतु हिंसा, अराजकता और कानून से ऊपर स्वयं को मान लेने की प्रवृत्ति किसी भी सभ्य समाज को स्वीकार नहीं हो सकती। भारत की आत्मा संघर्ष से नहीं डरती, वह संघर्ष को सृजन में बदलना जानती है। यही इस राष्ट्र की सनातन शक्ति है।

​हर संकट हमें दो रास्ते देता है—एक, दोषारोपण का; दूसरा, सुधार का। पहला मार्ग तात्कालिक संतोष देता है, दूसरा पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित करता है। आज आवश्यकता दूसरे मार्ग को चुनने की है।

​NEET विवाद का अंतिम निष्कर्ष किसी राजनीतिक विजय या पराजय में नहीं, बल्कि ऐसी परीक्षा व्यवस्था के निर्माण में होना चाहिए, जहाँ प्रश्नपत्र से पहले किसी की पहुँच न हो, जहाँ प्रतिभा पर किसी प्रकार की छाया न पड़े और जहाँ प्रत्येक विद्यार्थी यह अनुभव करे कि भारत उसकी मेहनत के साथ न्याय करेगा।

​जब व्यवस्था ईमानदार होती है, तब राष्ट्र शक्तिशाली बनता है। और जब राष्ट्र अपनी प्रतिभा की रक्षा करना सीख जाता है, तब उसका भविष्य किसी भी चुनौती से बड़ा हो जाता है। यही इस पूरे विमर्श का सार है, यही समय की पुकार है और यही भारत के अमृतकाल की सबसे बड़ी आवश्यकता भी।



अमित राव पवार, 

देवास (म.प्र.)

युवा लेखक-साहित्यकार


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