रोटियां
वो क्या जाने कितनी कीमती है रोटियां,
जिन्हे मिली हर वक्त थाली में सजा के रोटियां।
जिसने काटी है अक्सर राते भूख से तड़फ कर,
पूछो उनसे कभी की क्या होती हैं रोटियां।
भर जाए पेट तो छोड़ देते है थाली में यू ही,
और कुछ लोग कचरे में भी ढूंढते है रोटियां।
हां छोड़ आया हूं गांव की गलियां सुनी ही,
ताकि शहर में कमा सकूं मैं चंद रोटियां ।
मिटती ही नहीं भूख कई - कई दफा मेरी,
ढूंढता रहता हूं डब्बे में मां के हाथ की रोटियां।
और खुद पर गुजरी तो जाना ये राज़ मैने,
किन मुश्किलों से पिता ने कमाई होगी रोटियां ।
रविन्द्र तंवर "सूर्योदय"
बड़वाह (म. प्र.)


No comments:
Post a Comment