नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। कथाव्यास प्रो. पूनम लखनपाल ने प्रो.सुधाकराचार्य त्रिपाठी की प्रेरणा से शास्त्रीनगर में निजनिवास पर सामवेद की अष्टमकथा के छठे दिन सामवेद के पञ्चम एवं षष्ठ प्रपाठक की कथा के अन्तर्गत पवमान सोम, इन्द्र, अग्नि और सूर्य, सरस्वती आदि देवताओं से सम्बन्धित मन्त्रों की कथा कही।
ऋषि सोम से प्रार्थना करते हैं - हे सोम! आप द्युलोक से जलों की तरंगों से युक्त वृष्टि कर हमें स्वास्थ्यकारी अन्न हमें प्रदान करें। आप पैदा होने वालों में, गर्भ धारण करने वालों में श्रेष्ठ हैं। ऊर्जा की धाराओं को प्रवाहित कीजिए देवगण आपके शब्द सुनकर प्रसन्न हों। हे सोम! शत्रुनाशक, सर्वद्रष्टा, देवताओं की इच्छानुसार कार्य करने वाले हैं,आप हमारी इन्द्रियों को शान्त कीजिए। हे इन्द्र! आप सूर्य के समान तेजस्वी, बलशाली, मानव हितैषी, दाताओं के समक्ष प्रकट होने वाले हैं। आप वृत्र के निन्यानवें पुरों का विनाश करने वाले हैं अर्थात् अस्थियों के जोड़ों में व्याप्त रोगों का विनाश करने वाले हैं। आप हर दिन, हर समय हमारी रक्षा कीजिए।
सूर्य की स्तुति के अन्तर्गत गायत्री मन्त्र, सावित्री मन्त्र की व्याख्या की गई। उसका जाप किया गया। देवी सरस्वती स्तुत्य हैं, वह गायत्री आदि सात छन्दों गंगा आदि सात नदियों से सेवित हैं। ब्रह्मणस्पति, अग्निपवमान,मित्रावरुण, हवीषि आदि से सम्बन्धित मन्त्रों का भी उल्लेख हुआ। अग्नि देवता यज्ञों को सम्पन्न करने वाले, मानवमात्र का कल्याण करने वाले, दूरस्थ - निकटस्थ को जानने वाले, बलशालियों में बलवान्, उन्हें यज्ञों में बुलाया जाता है। वह देवताओं को यज्ञ में आहुत हव्य सामग्री पहुँचा कर मानव का उपकार करते हैं।

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