नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। कथाव्यास प्रो. पूनम लखनपाल ने मयूर विहार में प्रो.सुधाकराचार्य त्रिपाठी के आवास पर सामवेद की सप्तमकथा के सातवें दिन सामवेद में बताया कि हम सोम से प्रार्थना करते हैं कि वे हमारे पास आकर हमारी कामनाओं को पूरा करें। जैसे योद्धा युद्ध की ओर आते हैं वैसे ही सोम यज्ञ की ओर आते हैं। यज्ञ सात याजकों द्वारा करवाया जाता है।सप्त की संख्या का बहुत ही महत्व है।जैसे सात ऋषि, सात नदियां, सात समुद्र, सात पर्वत, सात चक्र आदि।
सोम इन सात चक्रों द्वारा संस्कारयुक्त किया जाता है। सोम एकमात्र ऐसा है जो पूर्णता प्रदान करता है।वह उषा को व सूर्य को तेजस्वी बनाता है, अपने श्रोताओं को ओज प्रदान करता है व सबको आनन्दित करता है।वह नित नवीन भी है और पुरातन भी है।वह नेत्रों से सूर्य दर्शन कराता है वह यज्ञ की नाभि के समान है।देवताओं के द्वारा द्युलोक में दर्शनीय हैं व लोगों के द्वारा हृदय में दर्शनीय हैं। स्तुतियों के माध्यम से इन्द्र आदि देवताओं के साथ यज्ञ में पहुंचकर हमें आनन्द प्रदान करते हैं। ये स्तुतियां भोजन, उसे बनाने वाले व उसे खाने वाले व्यक्ति को पवित्र बना देती हैं। हे सोम! आप सुखदायी हों,पोषण करने वाले हो व सभी पदार्थों को देने वाले हो। आप हमें धन,उत्तम ज्ञान,श्रेष्ठ संतति दीजिए व हमें अपना मित्र बनाइये।

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