तरुण आहूजा
नित्य संदेश, मेरठ। आवासीय क्षेत्रों में वर्षों से संचालित हो रहे स्कूल, हॉस्पिटल और मेडिकल स्टोरों पर की जा रही सीलिंग कार्रवाई ने अब आम जनता की परेशानियों को बढ़ा दिया है। सबसे ज्यादा दिक्कत उन मरीजों, बुजुर्गों, महिलाओं और छोटे बच्चों को उठानी पड़ रही है, जो अपने क्षेत्र में ही चिकित्सा सुविधा और शिक्षा पर निर्भर थे। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह स्थिति अचानक पैदा नहीं हुई, बल्कि यह वर्षों की प्रशासनिक लापरवाही और आवास विकास विभाग की गलत नीतियों का परिणाम है, जिसका खामियाजा आज आम नागरिक भुगत रहे हैं।
क्षेत्रवासियों का आरोप है कि जिन इमारतों में लंबे समय से स्कूल, हॉस्पिटल, क्लीनिक और मेडिकल स्टोर संचालित हो रहे थे, वहां विभाग की जानकारी के बिना यह सब संभव नहीं था। लोगों का सवाल है कि जब वर्षों तक विभाग ने कोई आपत्ति नहीं जताई, बिजली-पानी के कनेक्शन चलते रहे, बच्चों का एडमिशन होता रहा, मरीज इलाज कराते रहे, तब अचानक कार्रवाई क्यों शुरू की गई? यदि निर्माण और संचालन नियमों के विरुद्ध थे, तो समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई? स्थानीय अभिभावकों का कहना है कि स्कूल सील होने के बाद छोटे बच्चों को दूर के विद्यालयों में भेजना मजबूरी बन गया है। सुबह जल्दी उठाकर कई किलोमीटर दूर स्कूल छोड़ने और लाने की समस्या ने परिवारों की दिनचर्या बिगाड़ दी है। खासकर कामकाजी परिवारों और महिलाओं को अतिरिक्त परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। कई अभिभावकों का कहना है कि छोटे बच्चों की सुरक्षा को लेकर भी चिंता बढ़ गई है। वहीं, हॉस्पिटल, क्लीनिक और मेडिकल स्टोरों के बंद होने का असर मरीजों पर साफ दिखाई दे रहा है। पहले जहां क्षेत्र में ही तुरंत प्राथमिक उपचार और दवाइयां उपलब्ध हो जाती थीं, अब लोगों को कई किलोमीटर दूर अस्पतालों और मेडिकल स्टोरों का रुख करना पड़ रहा है। बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और गंभीर मरीजों के लिए यह परेशानी और भी बड़ी बन गई है। कई लोगों का कहना है कि आपातकालीन स्थिति में समय पर इलाज न मिलना जानलेवा भी साबित हो सकता है। क्षेत्रवासियों ने सवाल उठाया कि यदि आवास विकास विभाग को नियमों का पालन कराना था, तो पहले वैकल्पिक व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए थी। अचानक सीलिंग की कार्रवाई से सबसे ज्यादा नुकसान आम जनता को हो रहा है, जबकि वर्षों तक व्यवस्थागत खामियों पर आंखें मूंदे रखने वाले जिम्मेदार अधिकारी जवाबदेही से बचते नजर आ रहे हैं।
स्थानीय व्यापारियों और सामाजिक संगठनों ने भी इस मुद्दे पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि कार्रवाई नियमों के तहत होनी चाहिए, लेकिन इसका असर बच्चों की शिक्षा और मरीजों के इलाज पर नहीं पड़ना चाहिए। प्रशासन को चाहिए कि वह जनता की बुनियादी सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए कोई संतुलित समाधान निकाले। अब बड़ा सवाल यह खड़ा हो रहा है कि क्या वर्षों की प्रशासनिक लापरवाही और गलत नियोजन का बोझ केवल आम जनता ही उठाएगी? जिन बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है और जिन मरीजों को इलाज के लिए भटकना पड़ रहा है, उसकी जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा?

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