नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। आभा मानव मंदिर वरिष्ठ नागरिक सेवा सदन में श्रीमद् भागवत कथा के सातवें दिन की कथा कही गई। व्यास पूजन सुरेश चंद्र गोविंल व आभा गोविंल ने किया। सुदामा चरित्र सुनाते हुए व्यास पीठ से आचार्य पंडित विनय शास्त्री ने कहा कि भक्त सुदामा अत्यंत निर्धन ब्राह्मण थे व भिक्षा मांग कर जीवन यापन करते थे। पत्नी सुशीला के बार-बार आग्रह करने पर सुदामा अपने मित्र श्री कृष्ण से मिलने द्वारका पहुंचते हैं
सुदामा का नाम सुनते ही श्री कृष्ण नंगे पैर दौड़े चले आते हैं और सुदामा को गले लगा कर रोने लगते हैं और सुदामा को सिंहासन पर बैठ कर अपने आंसुओं से चरण धोते हैं। सुदामा जब वापस लौटते हैं तो उनकी झोपड़ी की जगह महल बन चुका होता है लेकिन सुदामा की भक्ति ऐसी थी कि उनका मन सांसारिक मोह माया से दूर ही रहता है। जरासंध वध, शिशुपाल वध, गौदान व राजा नृग की कथा सुनाई गई। शुकदेव जी महाराज परीक्षित को बताते हैं कि जन्म व मृत्यु केवल शरीर की होती है ,आत्मा अजर है अमर है, नित्य है। राजा परीक्षित कथा श्रवण के कारण मृत्यु के बाद भगवान के परमधाम पहुंचते हैं ।आचार्य जी ने कहा कि आज मनुष्य में विवेक की कमी के कारण बुद्धि भ्रमित रहती है और कई युवा गलत राह चुन लेते हैं। हमें अपनी वैचारिक शक्ति को सकारात्मक कार्यों व समाज और राष्ट्र के उत्थान में लगाना चाहिए ।
कथा श्रवण और कीर्तन का प्रभाव बताते हुए आचार्य जी ने कहा कि जो व्यक्ति भगवान के नाम गुण और लीलाओं का कीर्तन करता है उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। भगवान नाम की महिमा ऐसी है कि वह केवल व्यक्ति को शुद्ध ही नहीं करता बल्कि उसके आसपास के वातावरण को भी पवित्र बना देता है। जिस वाणी से भगवान श्री कृष्ण के नाम गुण और लीलाओं का उच्चारण नहीं होता वह वाणी भले ही सुंदर, भावपूर्ण और अलंकारों से युक्त क्यों ना हो लेकिन वह व्यर्थ और निरर्थक ही है।

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