नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के उर्दू विभाग और आयुसा के संयुक्त तत्वावधान में “बाल साहित्य के विकास में महिलाओं की भूमिका” विषय पर एक महत्वपूर्ण ऑनलाइन कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता पूर्व विभागाध्यक्ष, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी प्रोफेसर सगीर अफ़राहीम ने की, जबकि संरक्षक के रूप में प्रसिद्ध साहित्यकार एवं आलोचक प्रोफेसर असलम जमशेदपुरी उपस्थित रहे।
अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रोफेसर सगीर अफ़राहीम ने कहा कि महिलाओं ने उस समय भी बच्चों के साहित्य के बारे में सोचा, लिखा और पढ़ा, जब साहित्य का बाकायदा विकास भी नहीं हुआ था। उन्होंने कहा कि हमारे मदरसों, स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को बच्चों के साहित्य पर गंभीरता से काम करना चाहिए। उनका कहना था कि वातावरण में थोड़ी सी तल्खी भी बच्चों के मन और हृदय पर गहरा प्रभाव डालती है, इसलिए हमें अपनी सोच, दृष्टिकोण और बोलचाल के तरीके में बदलाव लाना होगा। कार्यक्रम की शुरुआत सईद अहमद द्वारा कुरआन पाक की तिलावत से हुई, जबकि एम.ए. प्रथम वर्ष की छात्रा महविश ने नात पेश की। संचालन डॉ. शादाब अलीम ने किया तथा स्वागत एवं परिचयात्मक शब्द डॉ. इरशाद सियानवी ने प्रस्तुत किए। धन्यवाद ज्ञापन फरहत अख्तर ने किया।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में प्रसिद्ध कथाकार क़मर जमाली हैदराबाद से शामिल हुई, जबकि दिल्ली से प्रसिद्ध अफ़सानानिगार नईमा जाफ़री पाशा विशिष्ट अतिथि रहीं। शोध-पत्र प्रस्तुत करने वालों में शाह ताज ख़ान, पुणे और नुज़हत अख्तर, मेरठ शामिल थीं, जबकि आयुसा की अध्यक्ष प्रोफेसर रेशमा परवीन भी वक्ता के रूप में उपस्थित रहीं। कार्यक्रम का परिचय प्रस्तुत करते हुए प्रोफेसर असलम जमशेदपुरी ने कहा कि जब हम महिला लेखिकाओं को पढ़ते हैं तो पता चलता है कि उन्होंने किसी न किसी रूप में बच्चों के लिए अवश्य लिखा है। उन्होंने कहा कि बच्चों के लिए लिखना अत्यंत महत्वपूर्ण और जिम्मेदारी का कार्य है। कुर्रतुलऐन हैदर जैसी महान लेखिका ने भी बच्चों के लिए कहानियाँ लिखीं, लेकिन दुख की बात है कि अनेक बड़ी महिला साहित्यकारों ने इस क्षेत्र में अपेक्षाकृत कम लिखा।
नुज़हत अख्तर ने “उर्दू बाल साहित्य और बानो सरताज : एक अध्ययन” विषय पर शोध-पत्र प्रस्तुत करते हुए कहा कि डॉ. बानो सरताज बाल साहित्य का एक महत्वपूर्ण नाम हैं। उन्होंने बच्चों के लिए नाटक, उपन्यास, कविताएँ और अनुवाद लिखे तथा उनके साहित्य में बच्चों के मार्गदर्शन का सुंदर स्वरूप मिलता है। शाह ताज ख़ान ने “आधुनिक उर्दू बाल साहित्य और महिलाओं का साहित्य” विषय पर अपना शोध-पत्र प्रस्तुत करते हुए कहा कि बाल साहित्य बच्चों की शिक्षा, प्रशिक्षण और नैतिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उन्होंने कहा कि महिलाओं का शिक्षित होना आवश्यक है, तभी वे बच्चों के लिए बेहतर साहित्य प्रस्तुत कर सकती हैं। उनके अनुसार आज उर्दू बाल साहित्य में विज्ञान, तकनीक और प्रेरणादायक कहानियों को भी शामिल किया जा रहा है।
नईमा जाफ़री पाशा ने कहा कि आज के बच्चे पहले जैसे नहीं रहे, इसलिए बाल साहित्य में आधुनिक समस्याओं, विज्ञान और तकनीक को शामिल करना ज़रूरी है। उन्होंने विशेष रूप से कहा कि बाल साहित्य में साइंस फिक्शन पर अधिक लेखन होना चाहिए। मुख्य अतिथि क़मर जमाली ने कहा कि आज महिलाएँ बाल साहित्य में वैज्ञानिक साहित्य प्रस्तुत कर रही हैं, जो अत्यंत स्वागतयोग्य है। उन्होंने कहा कि आज के बच्चे केवल उपदेश पसंद नहीं करते, इसलिए बच्चों के साहित्य को नए ढंग से लिखना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। कार्यक्रम में डॉ. आसिफ अली, डॉ. अलका वशिष्ठ, सैयदा मरियम इलाही, फरहत अख्तर, मोहम्मद शमशाद तथा अन्य छात्र-छात्राएँ भी जुड़े रहे।

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