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Saturday, May 16, 2026

भूली बिसरी यादें- 'नियामत खाना' नहीं बिन बिजली रेफ्रिजरेटर कहिए जनाब

सलीम सिद्दीकी

नित्य संदेश, मेरठनियमत खाना! फारसी भाषा का यह शब्द सुनते ही लोग भूतकाल का वो समय याद करते हैं जब भारत सहित कुछ  दक्षिण एशियाई देशों में लोग इस बिन बिजली के रेफ्रिजरेटर का व्यापक इस्तेमाल करते थे।आधुनिक समय में (रेफ्रिजरेटर के व्यापक उपयोग से पहले) भारतीय और दक्षिण एशियाई घरों में भोजन को स्टोर करने के लिए इसका व्यापक उपयोग किया जाता था। 


नियामत खाना लकड़ी, धातु या तार की जाल से बना वह संदूक या अलमारी होती है जिसका उपयोग अधिकतर लोग रेफ्रिजरेटर के वजूद में आने से पहले पके हुए भोजन को सुरक्षित रखने के लिए करते थे। जालीदार दीवारों के कारण इसमें वेंटिलेशन (हवा का संचार) होता था जिससे भोजन खराब नहीं होता था।  मक्खी, कीड़े और चींटी इत्यादि से भी यह सुरक्षित थी। देश आज भले ही आधुनिक क्रांति के दौर से गुजर रहा हो, इसके बावजूद भी देश का एक बड़ा ग्रामीण क्षेत्र इस बिन बिजली के रेफ्रिजरेटर का गवाह है। कुछ  कारपेंटर्स (बढ़ई) के अनुसार ग्रामीण क्षेत्र, छोटे कस्बे व देहातों में आज भी उनके पास नियामत खाने बनाने के आर्डर आते रहते हैं। 


दरअसल उर्दू अथवा फारसी भाषा में 'नेमत' का अर्थ भोजन के रूप में ईश्वर की देन होता है जबकि 'खाना' का अर्थ स्थान होता है। इसके दरवाजे और दीवारें महीन जाली से बनी होती हैं जो भोजन को धूल, मक्खियों और कीड़े-मकोड़े से बचाती हैं और इसके अंदर हवा का वेंटिलेशन उचित होने के कारण ठंडक बनी रहती है और खाना भी ताजा रहता है। पहले के घरों में रेफ्रिजरेटर की जगह इन्हीं नियामत खानों ने ले रखी थी। आज भी इन नियामत खानों को दादी अथवा परदादी के दहेज का रेफ्रिजरेटर कहा जाता है। मेरठ के खैरनगर में नियामत खाना बनाने वाले कारीगर इरशाद बताते हैं कि वर्तमान समय में नियमित खाने की कीमत 2000 रुपए से 8000 रुपए तक आती है।

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