नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। कथाव्यास प्रो. पूनम लखनपाल ने मयूर विहार में प्रो.सुधाकराचार्य त्रिपाठी जी के आवास पर सामवेद की सप्तमकथा के पांचवे दिन सामवेद में सोम के स्वरुप और सोम के वैशिष्टय की कथा कही।
आज की कथा में बहुत सारे ऋषियों के मंत्रों का वर्णन है। इस प्रपाठक में देवता हैं पवमान सोम आदि। ऋषिगण सोम की स्तुति करते हुये कहते हैं कि आप वह महत्त्वपूर्ण तत्त्व हैं जो इस यज्ञ के लिए प्रकाशक हैं व धन सम्पत्ति और आनन्द को बढाने वाले हैं।
आप वीर्यवान् हैं आपने वीर्यवान् संतानें उत्पन्न करने वाले ह्रैं। आप हमें भी धन, धान्य,पशु,सम्पदा व समस्त दिव्य विभूतियां प्रदान करें। सोम पंचाग्नि द्वारा परिमार्जित होता है। वह शक्तिवर्धक है,महान् है,वह ध्वनि करता हुआ सूर्य के समान प्रकाशित होता है व समस्त दोषों को दूर कर देता है। ऋषियों की स्तुतियां आपको ओज से परिपूर्ण कर देती हैं *तव प्रशस्तये महे।
हम भी आपकी स्तुति व प्रशंसा करते हैं। हे सोम आप हमें भी मधु की धारा से पवित्र कर दीजिए। हमें ऐसा वैशिष्ट्य दीजिए कि हम उस आत्मतत्त्व को धारण कर सकें। *अथा नो वस्यसस्कृधि। हमारा कल्याण हो हमारा हित हो व हम आन्तरिक और बाह्य शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर सकें। हे सोम आप लौकिक व पारलौकिक दोनों प्रकार की धन सम्पदा से हमें परिपूर्ण कीजिये जिससे हमें आन्तरिक सुख की प्राप्ति हो। *तरत्स मन्दी धावति* जैसे गाय बछड़े की ओर भागती है वैसे ही सोम हमारी ओर भागता है। जमदग्नि ऋषि द्वारा प्रशंसा किये जाते हुये आप हम सभी को पोषण प्रदान कीजिये। हे अग्निदेव आप स्तुति के योग्य हैं। आपकी स्तुति करने से बुद्धि प्रखर होती है। हम आपसे दीर्घायु व स्वास्थ्य की कामना करते हैं। अग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव।

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