नित्य संदेश। भारत जैसे महान लोकतंत्र में, जहाँ “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते” की परंपरा रही है, वहाँ यह प्रश्न बार-बार उठता है कि देश की आधी आबादी — हमारी माताएँ, बहनें और बेटियाँ — अब भी नेतृत्व के सर्वोच्च स्तर पर क्यों पूरी भागीदारी नहीं प्राप्त कर सकीं?
महिला आरक्षण का विषय कोई नया नहीं है। दशकों से यह माँग उठती रही है कि संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व दिया जाए, ताकि निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनकी आवाज़ भी उतनी ही प्रभावशाली हो जितनी पुरुषों की।
लेकिन दुःखद वास्तविकता यह है कि जब-जब इस ऐतिहासिक अवसर को साकार करने का समय आया, तब-तब राजनीति के कुछ स्वार्थी समीकरणों ने इसे अधूरा छोड़ दिया।
माननीय प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए कई ऐतिहासिक क़दम उठाए। चाहे “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” अभियान हो, उज्ज्वला योजना हो, या महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान के लिए बनाई गई नीतियाँ — हर स्तर पर महिला शक्ति को मज़बूत करने का प्रयास स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
इसी क्रम में महिला आरक्षण को लेकर भी सरकार की मंशा साफ़ रही कि देश की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाया जाए और उन्हें नेतृत्व का अवसर मिले।
गृह मंत्री जी सहित सरकार के अन्य ज़िम्मेदार मंत्रियों ने भी इस दिशा में कई बार सकारात्मक पहल की। संसद में इस विषय पर गंभीर चर्चा हुई, लेकिन जिस एकजुटता की अपेक्षा थी, वह दुर्भाग्यवश विपक्षी दलों से देखने को नहीं मिली।
प्रश्न यह उठता है कि आख़िर क्यों कुछ विपक्षी दल इस मुद्दे पर स्पष्ट समर्थन देने से पीछे हटते रहे?
क्या यह केवल राजनीतिक मतभेद था, या फिर कहीं न कहीं यह डर था कि अगर महिलाओं को बराबरी का अवसर मिला, तो पारंपरिक सत्ता समीकरण बदल जाएँगे?
यह भी उतना ही महत्वपूर्ण प्रश्न है कि क्या देश की राजनीति में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी से कुछ दलों के स्थापित ढाँचे को चुनौती मिलती है? यदि हाँ, तो क्या यह लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध नहीं है?
यह कहना ग़लत नहीं होगा कि जब देश की आधी आबादी को नेतृत्व से दूर रखा जाता है, तो यह केवल महिलाओं का ही नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र के विकास का नुक़सान होता है।
महिलाएँ केवल परिवार नहीं संभालतीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के निर्माण में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। वे शिक्षा, स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था, सामाजिक सुधार और प्रशासन हर क्षेत्र में अपनी क्षमता साबित कर चुकी हैं। ऐसे में उन्हें निर्णय लेने के मंच से दूर रखना एक प्रकार से देश की प्रगति को सीमित करना है।
आज भारत की महिलाएँ हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं — विज्ञान, तकनीक, राजनीति, खेल, सेना और प्रशासन में उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। ऐसे में राजनीतिक प्रतिनिधित्व में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करना समय की माँग ही नहीं, बल्कि न्याय का प्रश्न भी है।
यदि महिला आरक्षण विधेयक को समय रहते व्यापक समर्थन मिला होता, तो आज देश की संसद और विधानसभाएँ और अधिक संतुलित, समावेशी और संवेदनशील होतीं।
यह भी विचारणीय है कि जब सरकार इस दिशा में प्रयास कर रही थी, तब विपक्षी दलों को भी राष्ट्रहित में सहयोग करना चाहिए था। लेकिन दुर्भाग्य से राजनीतिक मतभेदों ने इस महत्वपूर्ण विषय को पीछे धकेल दिया।
आज आवश्यकता है कि राजनीति से ऊपर उठकर इस विषय को देखा जाए। यह किसी एक दल का मुद्दा नहीं है — यह भारत की हर बेटी, हर बहन और हर माँ का अधिकार है।
हमें यह समझना होगा कि जब महिलाओं को नेतृत्व में समान अवसर मिलेगा, तभी समाज में वास्तविक समानता स्थापित होगी।
अंततः यह प्रश्न देश की जनता के सामने है —
क्या हम अपनी आधी आबादी को उनका अधिकार देंगे, या फिर राजनीतिक स्वार्थों के चलते उन्हें प्रतीक्षा में ही रखेंगे?
अब समय आ गया है कि देश की हर महिला की आवाज़ को संसद और विधानसभाओं तक पहुँचाया जाए, ताकि भारत का लोकतंत्र वास्तव में पूर्ण और सशक्त बन सके।
नारी शक्ति केवल सम्मान की प्रतीक नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की आधारशिला है — और जब तक उन्हें बराबरी का अधिकार नहीं मिलेगा, तब तक भारत की प्रगति अधूरी ही रहेगी।
शाहीन परवेज एडवोकेट
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