नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय के जेंडर सेंसिटाइजेशन सेल एवं गणेश शंकर विद्यार्थी सुभारती पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के संयुक्त तत्वावधान में “जेंडर-न्यूट्रल सिनेमा: वास्तविकता या भ्रम?” विषय पर वाद-विवाद प्रतियोगिता का सफलतापूर्वक आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम विभाग के भारतेंदु हरिश्चंद्र संगोष्ठी कक्ष में आयोजित किया गया, जिसमें विभिन्न विभागों के विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
इस प्रतियोगिता का उद्देश्य सिनेमा में लैंगिक प्रस्तुति और उसके सामाजिक प्रभाव पर विद्यार्थियों के बीच जागरूकता उत्पन्न करना तथा समसामयिक विषयों पर तार्किक और विश्लेषणात्मक चिंतन को बढ़ावा देना था। प्रतिभागियों ने अपने विचार आत्मविश्वास, तार्किकता और प्रभावशाली अभिव्यक्ति के साथ प्रस्तुत किए, जिससे प्रतियोगिता अत्यंत ज्ञानवर्धक और रोचक बनी रही। कार्यक्रम के निर्णायक मंडल में डॉ. प्रीति सिंह एवं डॉ. आशुतोष वर्मा रहे। निर्णायकों ने प्रतिभागियों का मूल्यांकन विषयवस्तु, प्रस्तुति शैली, आत्मविश्वास तथा विचारों की स्पष्टता के आधार पर किया। अपने संबोधन में उन्होंने विद्यार्थियों की शोधपरक प्रस्तुति की सराहना की और उन्हें मीडिया तथा समाज में लैंगिक मुद्दों के प्रति संवेदनशील रहने के लिए प्रेरित किया। इस अवसर पर पत्रकारिता विभाग के सहायक आचार्य राम प्रकाश तिवारी ने भी विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए विषय पर अपने महत्वपूर्ण विचार साझा किए। उन्होंने बताया कि सिनेमा समाज की सोच और दृष्टिकोण को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है तथा मीडिया से जुड़े विद्यार्थियों की जिम्मेदारी है कि वे संतुलित और समावेशी प्रस्तुति को बढ़ावा दें।
प्रतियोगिता में बीएजेएमसी द्वितीय वर्ष की छात्रा प्रियांशी भाटिया ने प्रथम स्थान प्राप्त किया, बीएनवाईएस चतुर्थ वर्ष की छात्रा हर्षिता निषाद ने द्वितीय स्थान प्राप्त किया, जबकि बीए ऑनर्स इंग्लिश द्वितीय वर्ष की छात्रा सामिया एवं बीएनवाईएस चतुर्थ वर्ष के छात्र दीपक कुमार ने संयुक्त रूप से तृतीय स्थान प्राप्त किया। सभी विजेताओं को उनके उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए सराहा गया। इस कार्यक्रम का सफल संचालन एवं समन्वय शैली शर्मा, असिस्टेंट प्रोफेसर द्वारा किया गया। कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन के साथ यह संदेश दिया गया कि लैंगिक संवेदनशीलता और जिम्मेदार मीडिया प्रस्तुति से संबंधित चर्चाएँ वर्तमान समय में अत्यंत आवश्यक हैं।

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