--------------------------------------------------
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) एक बार फिर वैचारिक युद्ध और विवादों के केंद्र में है। हाल ही में उमर खालिद और शरजील इमाम की सुप्रीम कोर्ट द्वारा जमानत याचिका खारिज क्या हुई, यहां के वामपंथी विचारधारा के छात्रों ने प्रागंण में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर जो उद्दण्डता की है वह गलत है। प्रदर्शनकारियों ने विरोध दर्ज करवाते हुए माननीय प्रधानमंत्री मोदी और सम्माननीय गृहमंत्री शाह के विरूद्ध मोदी-शाह तेरी कब्र खुदेगी जैसे गंभीर आपत्तिजनक नारे लगाए है।
भारत के प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों में शुमार जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) अपनी अकादमिक उत्कृष्टता से अधिक अब, अपनी विवादास्पद राजनीतिक संस्कृति के लिए सुर्खियों में रहता है। हालिया घटनाक्रम, जिसमें देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के विरुद्ध कब्र खुदेगी जैसे हिंसक और आपत्तिजनक नारे लगाए गए, केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं है, बल्कि यह उस गहरे वैचारिक संकट का संकेत है, जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अराजकता का लाइसेंस मान लिया गया है।
यह घटनाक्रम लोकतांत्रिक संस्थाओं का अनादर था। यह विरोध प्रदर्शन सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दंगों के आरोपियों की जमानत याचिका खारिज करने के बाद हुआ। लोकतंत्र में न्यायपालिका के फैसलों पर असहमति जताना नागरिक का अधिकार है, लेकिन उस असहमति को व्यक्तिगत हमलों और हिंसक नारों में बदलना सीधे तौर पर कानून के शासन को चुनौती देना है। जब छात्र मोदी-शाह तेरी कब्र खुदेगी जैसे नारे लगाते हैं, तो वे न केवल देश के शीर्ष नेतृत्व का अपमान करते हैं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया का भी मखौल उड़ाते हैं।
जिन आरोपियों के समर्थन में नारेबाजी हुई है उनके विरूद्ध साक्ष्यों के आधार पर निर्णय लिया गया है। वे अपराधी 2020 के दिल्ली दंगों का मुख्य मास्टरमाइंड है। अपने भड़काऊ भाषण के जरिए समाज को बांटने और हिंसा भड़काने वाले सिद्ध हुए है। उन पर देशद्रोह व यूएपीए की धाराएं भारत की एकता के विरूद्ध साजिश और आतंकी गतिविधियों में लिप्तता पाई गई है। उन लोगो ने सुनियोजित हिंसा को शांतिपूर्ण प्रदर्शन के नाम पर सोची-समझकर साजिश के तहत फैलाया था। सुप्रीम कोर्ट ने इनके खिलाफ ठोस सबूत मानते हुए ही जमानत से इनकार किया है।
विडम्बना है कि आज की युवा पीढ़ी, जेन-जी, सूचनाओं के अथाह सागर में जी रही है। सोशल मीडिया और इको चैम्बर्स (जहां केवल एक ही तरह के विचार सुनाई देते हैं) ने युवाओं के एक वर्ग को अतिवाद की ओर धकेल दिया है।
वे छात्र छात्राएं मात्र अपनी पहचान बनाने के लिए स्थापित व्यवस्था का विरोध खुद को कूल और क्रांतिकारी समझने के लिए ऐसे प्रदर्शन करने लगे हैं।
अक्सर छात्र गहन शोध के बजाय सोशल मीडिया पर परोसे गए आधे-अधूरे नैरेटिव्स का शिकार हो रहे हैं। जेएनयू जैसे परिसर में, जहां विमर्श की संस्कृति होनी चाहिए थी, वहां अब नारा-संस्कृति हावी हो गई है। छात्र छात्राओं के लिए सत्य तथ्य न जानना और देश विरोधी ताकतों के समर्थन में उठना गलत है।
जेएनयू प्रशासन को विश्वविद्यालय को राजनीति का अखाड़ा बनने से बचाना होगा। शिक्षालय भविष्य के निर्माता गढ़ने की जगह है, न कि सर्वोच्च पद पर आसीन के विरूद्ध धमकीभरी नारेबाजी करने वालों की। ऐसे छात्र छात्राओं के लिए दंड के प्रावधान सुनिश्चित करना चाहिए।
जेएनयू में बढ़ती इस मनमानी को रोकने के लिए कड़े अनुशासन की आवश्यकता है। वर्तमान नियमों में अनुशासन नियमावली के अनुरूप विश्वविद्यालय में भड़काऊ नारेबाजी, धरना और हिंसा के लिए भारी जुर्माने (20,000 से 30,000 रुपये तक) और निष्कासन जैसे प्रावधान तो हैं, लेकिन इसे कठोरता से बढ़ाना चाहिए।
कानूनी कार्रवाई का सहारा लेना भी उचित है। देश के प्रधानमंत्री के विरुद्ध हिंसक नारेबाजी केवल अभिव्यक्ति नहीं बल्कि भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धाराओं के तहत शांति भंग करने और आपराधिक धमकी की श्रेणी में आते है। प्रशासन को चाहिए कि वह राजनीति से ऊपर उठकर ऐसे तत्वों को चिन्हित करे जो शिक्षा के माहौल को विषाक्त कर रहे हैं।
अब समय आ गया है कि देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमाएं सुनिश्चित की जाए। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(ए) बोलने की आजादी देता है, लेकिन अनुच्छेद 19(2) इस पर तर्कसंगत प्रतिबंध भी लगाता है। सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और देश की अखंडता के विरुद्ध बोलने की अनुमति किसी को नहीं है और यही बात प्रत्येक को समझनी होगी।
वैश्विक अस्थिरता के समय में लोकतांत्रिक भारत में विरोध का स्वर संवाद होना चाहिए, विनाश की कामना नहीं।
वर्तमान समय में जेन-जी और आने वाली पीढ़ियों को सही दिशा में ले जाने के लिए कुछ अनिवार्य कदम उठाने होंगे:-
1. अकादमिक जवाबदेही तय हो - छात्रों की उपस्थिति और उनके अकादमिक प्रदर्शन को छात्र राजनीति से जोड़ा जाना चाहिए ताकि पेशेवर प्रदर्शनकारियों की संख्या कम हो सके।
2. सख्त कानून का क्रियान्वयन - अभिव्यक्ति की आड़ में देशविरोधी या हिंसक मानसिकता पालने वालों के खिलाफ बिना किसी रियायत के दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित होनी चाहिए।
3. वैचारिक विविधीकरण - परिसरों में केवल एक तरफा विचारधारा के बजाय स्वस्थ और संतुलित चर्चाओं को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
जेएनयू की इस घटना ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि समय रहते उद्दंडता को नहीं रोका गया, तो अभिव्यक्ति की गरिमा समाप्त हो जाएगी। छात्र देश का भविष्य हैं, लेकिन यदि वे शिक्षा के मंदिर में ही कब्र खोदने की भाषा बोलेंगे, तो उनमें और आततायियों में क्या फर्क रह जाएगा? वे समाज को क्या दिशा देंगे? जेन-जी को यह समझना होगा कि क्रांति नारों से नहीं, रचनात्मक कार्यों और संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर रहकर आती है।
जेएनयू विश्वविद्यालय के प्रशासन और सरकार को इनके पुराने टुकड़े-टुकड़े जैसे नारे और अब सर्वोच्च पद पर जनता के चुने प्रतिनिधियों को धमकी देने जैसे नारों के लिए अब जीरो टॉलरेंस की नीति अपनानी होगी ताकि शिक्षा का केंद्र राजनीतिक नफरत का अड्डा न बने।
- सपना सीपी साहू 'स्वप्निल'
स्वरचित, मौलिक व अप्रकाशित आलेख
No comments:
Post a Comment