-उर्दू
विभाग में साप्ताहिक कार्यक्रम 'अदबनुमा' के अंतर्गत "उर्दू में तज़किरा निगारी" विषय पर हुआ ऑनलाइन
कार्यक्रम
नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। आज की आलोचना को
आधुनिक आलोचना कहा जा सकता है। यही सभी आलोचकों का आधार है. उर्दू साहित्य के लिए
आलोचना बहुत महत्वपूर्ण हैं। हमें किसी बहस में नहीं पड़ना चाहिए. सभी श्रेणियां
महत्वपूर्ण हैं. हमें साहित्य और उसकी परंपराओं को समझना होगा। ये शब्द थे जर्मनी
के मशहूर लेखक और शायर आरिफ नकवी के, जो उर्दू विभाग द्वारा आयोजित
साप्ताहिक साहित्यिक कार्यक्रम "उर्दू में तज़किरा निगारी" विषय पर अपने
अध्यक्षीय भाषण के दौरान बोल रहे थे।
आबिद
अली ने पवित्र कुरान की तिलावत कर कार्यक्रम की शुरुआत की। लखनऊ से प्रोफेसर रेशमा
परवीन (अध्यक्ष, इंटरनेशनल यंग उर्दू स्कॉलर्स
एसोसिएशन (आईयूएसए)) ने वक्ता के रूप में भाग लिया। सुप्रसिद्ध कथा समीक्षक एवं कथाकार प्रो. असलम जमशेद पुरी
ने अपनी राय व्यक्त करते हुए कहा कि आज का विषय अत्यंत महत्वपूर्ण है, उर्दू में कथन की परंपरा प्राचीन एवं स्थिर रही है। उर्दू
आलोचना का मार्ग तज़किरा से आया है और जहाँ तक इसकी परंपरा का सवाल है, तज़किरे मीर के तज़किरे से लेकर आज तक लिखे जा रहे हैं।
फर्क सिर्फ इतना है कि बदलते वक्त के साथ तज़किरे की लिखावट में भी बदलाव आया है
और उन्होंने नये तज़किरे "सागर जाम जाम सुफ़ल" [असलम बद्र, जमशेदपुर] पर भी प्रकाश डाला है।
प्रोफेसर
रेशमा परवीन ने तज़किरों के संबंध में बहुत ही रोचक और उपयोगी जानकारी देते हुए
कहा कि आज का विषय छात्रों के लिए बहुत महत्वपूर्ण और उपयोगी है और चूंकि मेरा काम
भी मीर और उल्लेखों से संबंधित रहा है। यदि हम उल्लेखों को ध्यान से पढ़ें तो यह
स्पष्ट हो जाता है कि हमारी आलोचना का आधार उल्लेख ही हैं जिनके संबंध में हम
उल्लेखों से भी सहायता ले सकते हैं। वर्तमान युग में भी उल्लेखों का महत्व बना हुआ
है प्रस्तुत विचारों से आलोचकों की आलोचनात्मक चेतना भी देखी जा सकती है।
इस
अवसर पर क्षेत्र के शोध विद्वानों शाहे ज़मन और सैयदा मरियम इलाही ने उल्लेखों के
संबंध में अपने लेख प्रस्तुत किए, जिसका मुख्य बिंदु यह था कि उर्दू
में वैज्ञानिक अनुसंधान का कार्य कुछ वर्षों से शुरू हुआ है विस्तारित रूप में यह
कहा जा सकता है कि साहित्यिक शोध का सिलसिला सही अर्थों में बीसवीं शताब्दी ई. के
तीसरे दशक से प्रारंभ होता है क्योंकि इस कृति में प्रामाणिक स्रोतों तथा
महत्वपूर्ण सन्दर्भों का प्रयोग किया गया है, अतः इसका उल्लेख सामान्यतः किया
गया है यह कहना अप्रासंगिक नहीं होगा कि उर्दू में साहित्यिक आलोचना, जीवनी और इतिहासलेखन का शोध कार्य वास्तव में उल्लेखों के
सहारे ही आगे बढ़ा है। यदि ये उल्लेख हमारी अदबी दुनिया में मौजूद न होते तो हम
उर्दू की प्राचीन विरासत को खो देते भाषा और साहित्य, इसकी प्रकृति, इसकी शैलियाँ विकासवादी संबंधों से
अपरिचित हैं। हम यह भी नहीं जानते कि हमारे काव्य और साहित्य का इतिहास कितना
पुराना है क्योंकि प्राचीन काल में विद्वानों और शिक्षकों की पुस्तकें आम लोगों के
लिए सुलभ नहीं थीं। अत: उस समय इस बात की आवश्यकता महसूस की गई कि कम से कम इन
कवियों की शर्तों और उनके शब्दों के चयन को एक कर दिया जाए। इसी आवश्यकता के तहत
सबसे पहले फारसी उल्लेखों की स्थापना की गई एक कठिन कार्य था ।कभी-कभी चींटी के मुँह
से दाना इकट्ठा करना पड़ता है, तब तज़किरे की कुछ पंक्तियाँ तैयार
की जाती हैं। पुर में उर्दू तज़किरा निगारी का एक संक्षिप्त अवलोकन विस्तृत और
तर्कसंगत तरीके से प्रस्तुत किया गया है।
डॉ.
शादाब अलीम, डॉ. अलका वशिष्ठ, डॉ. इरशाद सयानवी, सईद अहमद सहारनपुरी, मोहम्मद शमशाद, इशरत नाहिद, यूसुफ रजा, राम पुरी, डॉ. शाकिर इस्लाही, जरीना, बेगम सादिया सलीम, सलीम अमरोहवी, मुश्ताक अहजान, मजहर कार्यक्रम में महमूद आदि
मौजूद रहे।

No comments:
Post a Comment