नवरात्रि
प्रथम दिन होती घटस्थापना,
स्वागत माँ का करते हैं।
नौ रूपों में पूजी जातीं,
पंडाल खूब सजते हैं।
यूँ तो बसी हो कण-कण में माँ,
फिर भी तुम नौ दिन आती हो।
हर नारी में है छवि तुम्हारी,
जन-जन को ये समझाती हो।
परस्त्री लगती माता,
हर बच्ची में देवी दिखती है।
और बीत जाते जब नौ दिन,
तो माँ तेरी छवि क्यों मिटती है।
नौ दिन तो करते खूब भक्ति,
दिन दसवें रावण बन जाते हैं।
कहीं लुटती लाज किसी की,
कहीं गर्भ में बेटी मरती है।
हे माँ जगदम्बा जगत-जननी,
"रवि" तेरी महिमा का क्या बखान करे।
कैसे करे तेरी भक्ति-आराधना,
माँ कैसे तेरा गुणगान करे।
इस बार माँ न आना तू मात्र नौ दिन,
हर दिन को नवरात्रि बना देना।
न लूटे किसी नारी की अस्मत,
बस इतनी कृपा बरसा देना।
— रविंद्र तंवर "सूर्योदय"


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