नित्य संदेश ब्यूरो
नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्तर के युवा इतिहासकारों तथा विभिन्न प्रांतो से संबद्ध युवा इतिहासकारों एवं समाज वैज्ञानिकों की टोली के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। बैठक में युवा इतिहासकारों एवं युवा समाज वैज्ञानिकों द्वारा किए जा रहे कार्यों के "प्रगति, उत्पादकता, गुणवत्ता एवं कार्य -स्थिति का विस्तृत अवलोकन एवं समीक्षा की गई ।" इस अवसर पर सभी इतिहासकारों को अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय संगठन सचिव, आदरणीय डॉ. बालमुकुंद पांडे जी का सानिध्य एवं पाथेय सभी को प्राप्त हुआ।
डॉ. पांडे जी ने युवा इतिहासकारों एवं युवा समाज वैज्ञानिकों के कार्यों को सूक्ष्मता पूर्वक अवलोकन करते हुए उन्हें इतिहास- लेखन एवं इतिहास संकलन के क्षेत्र में "अधिक गंभीरता, प्रमाणिकता, शोध- दृष्टि, गुणात्मकता एवं निरंतरता के साथ कार्य करने के लिए प्रेरित किए।" उनका मार्गदर्शन युवा इतिहासकारों के लिए प्रेरणादाई पाथेय के रूप में रहा।
उन्होंने अपने उद्बोधन के प्रारंभिक चरण में 'इतिहास दर्पण' के विकासात्मक चरण से जुड़े उन विद्वान आचार्यों के प्रति कृतज्ञता एवं आभार प्रकट किए, जिन्होंने अपने आत्मीय लगाव,अथक परिश्रम ,समर्पण एवं विवेकी प्रज्ञा का पूर्ण योगदान के माध्यम से जर्नल को उच्च स्तरीय एवं प्रतिष्ठित जर्नल स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने विशेष रूप से 'इतिहास दर्पण' को राष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित जर्नल के रूप में स्थापित करने में प्रोफेसर ( डॉ.)ईश्वर शरण विश्वकर्मा जी, प्रोफेसर (डॉ.) सुष्मिता पांडे जी एवं डॉ नरेंद्र शुक्ला के उल्लेखनीय योगदान को रेखांकित करते हुए उनके प्रति सम्मान एवं कृतज्ञता व्यक्त किए।
उन्होंने अपने उद्बोधन में कहा कि दशम युवा इतिहासकार सम्मेलन में प्रस्तुत किए गए शोध -पत्र उस उच्चतम अकादमिक एवं शोध परक मानक पर खरे " नहीं उतर सके ,जिसकी अपेक्षा एक प्रतिष्ठित इतिहासकार सम्मेलन से की जाती है। डॉ. पांडे जी ने स्पष्ट किया की ,"निरंतर अध्ययन, अनुशासन और परिश्रम के माध्यम से किसी भी कार्य को उत्कृष्टता के स्तर तक पहुंचाया जा सकता है।" उन्होंने गुरु- शिष्य परंपरा में निहित गुरु के प्रति निष्ठा ,संकल्प एवं समर्पण को जाग्रत करने पर बल देते हुए कहा कि गुरु के सानिध्य में रहकर मार्गदर्शन प्राप्त करने से शोध एवं इतिहास -लेखन के कार्य को "अधिक गुणवत्तापूर्ण और प्रामाणिक बनाया जा सकता है।" उन्होंने युवा इतिहासकारों एवं युवा समाज वैज्ञानिकों को तकनीकी एवं मशीनों का मात्र अनुकरण करने के बजाय उनका "विवेकपूर्ण एवं सृजनात्मक उपयोग" की प्रेरणा देते हुए कहा कि ,"हमें मशीनों का गुलाम बनने के बजाय उनका नियंत्रक ,संचालक एवं स्वामी बनना चाहिए।"
उन्होंने समकालीन चुनौतियों को अवसर के रूप में स्वीकार करते हुए युवा इतिहासकारों एवं युवा समाज वैज्ञानिकों से अपेक्षा की कि वे वर्तमान समस्याओं का "तार्किक, तथ्य आधारित, गुणवत्तापूर्ण एवं अवधारणात्मक विश्लेषण" कर उनके समाधान का मार्ग प्रशस्त करें। उनका कहना है कि भारत के इतिहास को विभिन्न कालखंडों में विकृत, एकांगी एवं पूर्वाग्रह दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है। अतः भारत के इतिहास का पुनर्पाठ,पुनर्लेखन , पुनर्मूल्यांकन तथा प्रमाण आधारित निष्पक्ष इतिहास लेखन का दायित्व वर्तमान के युवा इतिहासकारों एवं युवा समाज वैज्ञानिकों के कंधों पर है। "उन्हें भारतीय इतिहास की वास्तविकता, उसकी निरंतरता एवं उसकी बहुआयामी परंपरा को प्रमाणिक स्रोतों एवं वैज्ञानिक नवाचार के आधार पर स्थापित करने के लिए निष्ठा ,पवित्र साधन, आस्था एवं लगन के साथ कार्य करना चाहिए।"
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