नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में मंगलवार को इतिहास के विभिन्न आयामों पर केंद्रित पांच महत्वपूर्ण पुस्तकों का एक साथ विमोचन किया गया। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय की कुलपति प्रोफेसर संगीता शुक्ला ने पुस्तकों का विमोचन प्रसिद्ध इतिहासकार एवं पुरातत्वविद् डॉ. अमित राय जैन, शहजाद राय शोध संस्थान तथा डॉ. चंद्रकीर्ति भंते, विभागाध्यक्ष, बौद्ध अध्ययन विभाग, स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय की गरिमामयी उपस्थिति में किया।
विमोचित पुस्तकों में इतिहास विभाग के अध्यक्ष प्रो. कृष्णकांत शर्मा द्वारा लिखित दो पुस्तकें ‘Exploring Buddhism: History, Culture and Archaeology’ तथा ‘Buddhism in India: Wisdom and Compassion’ शामिल हैं। दोनों पुस्तकें भारत में बौद्ध धर्म के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं पुरातात्विक पक्षों को केंद्र में रखती हैं।इसके अतिरिक्त ‘ऐतिहासिक पर्यटन और भारतीय संदर्भ’ पुस्तक का भी विमोचन किया गया, जिसे प्रो. कृष्णकांत शर्मा, डॉ. दीपक कुमार, एस.वी. डिग्री कॉलेज तथा श्री विजय पाल ने संयुक्त रूप से लिखा है। यह पुस्तक भारत की ऐतिहासिक विरासत और पर्यटन के विकास के बीच संबंधों को रेखांकित करती है।
इतिहास विभाग की पूर्व विभागाध्यक्ष एवं प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो. गीता श्रीवास्तव की पुस्तक ‘Towards Freedom: Italy and India, 1815–1947’ भी इस अवसर पर विमोचित हुई। पुस्तक में इटली और भारत के स्वतंत्रता संघर्षों तथा दोनों के ऐतिहासिक संदर्भों का अध्ययन किया गया है। वहीं इतिहास विभाग की डॉ. मनीषा त्यागी द्वारा लिखित ‘South Asia and Greco-Roman Connectivity in History’ पुस्तक में दक्षिण एशिया तथा यूनानी-रोमन दुनिया के बीच ऐतिहासिक संपर्कों और संबंधों का अध्ययन प्रस्तुत किया गया है।
इतिहास लेखन को नई दिशा देने वाला कार्य : प्रो. संगीता शुक्ला
इस अवसर पर कुलपति प्रोफेसर संगीता शुक्ला ने इतिहास विभाग के अध्यक्ष प्रो. कृष्णकांत शर्मा तथा पुस्तक लेखकों को बधाई देते हुए कहा कि किसी भी विश्वविद्यालय की अकादमिक पहचान केवल उसके पाठ्यक्रमों और परीक्षाओं से नहीं, बल्कि उसके शोध, प्रकाशन और ज्ञान-सृजन से भी निर्मित होती है। इतिहास विभाग द्वारा एक साथ पांच पुस्तकों का प्रकाशन और उनका विमोचन विश्वविद्यालय की अकादमिक सक्रियता और शोधपरक वातावरण का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
उन्होंने कहा कि इतिहास केवल अतीत की घटनाओं का क्रमबद्ध विवरण नहीं है, बल्कि यह वर्तमान को समझने और भविष्य के लिए दिशा निर्धारित करने का महत्वपूर्ण माध्यम है। इतिहास के अध्ययन में जब पुरातत्व, संस्कृति, धर्म, पर्यटन, अंतरराष्ट्रीय संपर्क और सामाजिक परिवर्तन जैसे विविध आयाम जुड़ते हैं, तो इतिहास की समझ और अधिक व्यापक एवं समृद्ध होती है।
कुलपति ने कहा कि बौद्ध धर्म पर केंद्रित दोनों पुस्तकों के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा, बौद्ध दर्शन, संस्कृति और पुरातात्विक विरासत को समझने का अवसर मिलता है। इसी प्रकार ऐतिहासिक पर्यटन पर आधारित पुस्तक भारत की समृद्ध ऐतिहासिक विरासत को पर्यटन और विकास के साथ जोड़ने की संभावनाओं को सामने लाती है। इटली और भारत के स्वतंत्रता आंदोलनों तथा दक्षिण एशिया और यूनानी-रोमन सभ्यताओं के बीच संपर्क पर आधारित पुस्तकों से विद्यार्थियों और शोधार्थियों को तुलनात्मक एवं अंतरराष्ट्रीय दृष्टि विकसित करने में सहायता मिलेगी।
उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय में लगातार शोध एवं प्रकाशन की संस्कृति को प्रोत्साहित किया जा रहा है। इतिहास विभाग द्वारा किया जा रहा यह कार्य इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि इतिहास विभाग भविष्य में भी इसी प्रकार गुणवत्तापूर्ण शोध, मौलिक लेखन और महत्वपूर्ण ऐतिहासिक विषयों पर पुस्तकों का प्रकाशन करता रहेगा तथा विश्वविद्यालय के अकादमिक गौरव को नई ऊंचाइयों तक ले जाएगा।
कुलपति ने कहा कि पुस्तकों का प्रकाशन तभी सार्थक होता है, जब उसका लाभ विद्यार्थियों और शोधार्थियों तक पहुंचे। उन्होंने विभाग से अपेक्षा की कि इन पुस्तकों को विद्यार्थियों के अध्ययन और शोध के साथ जोड़ा जाए, ताकि नई पीढ़ी इतिहास को केवल विषय के रूप में नहीं, बल्कि समाज और सभ्यता को समझने के महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में देख सके।
पुस्तकों का वास्तविक ऐतिहासिक महत्व विद्यार्थियों से साझा किया
प्रसिद्ध इतिहासकार एवं पुरातत्वविद् डॉ. अमित राय जैन ने विमोचित पुस्तकों के ऐतिहासिक एवं अकादमिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इन पुस्तकों में इतिहास के अलग-अलग पक्षों को शोधपरक दृष्टि से प्रस्तुत किया गया है। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि इतिहास का अध्ययन केवल पुस्तकों तक सीमित न रहकर स्रोतों, पुरातात्विक साक्ष्यों और विभिन्न ऐतिहासिक संदर्भों के साथ किया जाना चाहिए।
डॉ. चंद्रकीर्ति भंते ने इतिहास विभाग को इस उपलब्धि के लिए बधाई देते हुए कहा कि बौद्ध धर्म, भारतीय संस्कृति और इतिहास से जुड़े विषयों पर निरंतर शोध और लेखन समाज के लिए भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने इतिहास विभाग के उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए प्रो. कृष्णकांत शर्मा को विभाग की अकादमिक उन्नति के लिए साधुवाद दिया। कार्यक्रम को गरिमा प्रदान करने के लिए प्रो. मनीला भंते, दीपशरण तथा डॉ. पल्लवी मुखर्जी, सुभारती विश्वविद्यालय सहित अनेक शिक्षाविदों ने सहभागिता की।
इस अवसर पर विश्वविद्यालय के प्रो. सिद्दीकी, प्रो. वैशाली, डॉ. विवेक त्यागी, प्रो. आराधना, प्रो. अजय, विजय कौर, प्रो. विग्नेश त्यागी, डॉ. योगेश मोरल, डॉ. कुलदीप कुमार, डॉ. मनीषा त्यागी, डॉ. शालिनी, सुश्री प्रज्ञा माहेश्वरी सहित इतिहास विभाग के शिक्षक, शोधार्थी एवं बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे। कार्यक्रम के अंत में इतिहास विभाग की ओर से सभी अतिथियों, शिक्षकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों का आभार व्यक्त किया गया।

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