सीसीएस विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में ‘शमीम हनफ़ी की नाटक लेखन’ विषय पर ऑनलाइन कार्यक्रम आयोजित
नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। “रचना से ही आलोचना का जन्म हुआ है। रेडियो नाटक मंच पर सफल नहीं होते, क्योंकि उनके लिए संगीत और पर्दा भी आवश्यक होता है। रेडियो और मंचीय नाटक में जो प्रमुख अंतर होता है, वह पर्दे का है। यह पर्दा भी ऐसा होता है जो श्रोताओं और दर्शकों को नाटक से जोड़े रखता है। शमीम हनफ़ी ने अपने जीवन के अंतिम दौर में नाटक नहीं लिखे।” ये विचार अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर सगीर अफ़राहीम ने व्यक्त किए। वे उर्दू विभाग और एवसाक के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ऑनलाइन कार्यक्रम ‘शमीम हनफ़ी की नाटक लेखन’ विषय पर अपने अध्यक्षीय संबोधन में बोल रहे थे।
उन्होंने आगे कहा कि ‘ज़िंदगी की तरफ़’ शमीम हनफ़ी का एक महत्वपूर्ण नाटक है, जिसमें पर्दे के पीछे से अजीब-अजीब आवाज़ें सुनाई देती हैं, जिनका संबंध जीवन से होता है। रेडियो नाटकों में अनेक प्रकार की कठिनाइयाँ होती हैं। इससे पहले कार्यक्रम का आरंभ सईद अहमद ने पवित्र कुरआन के पाठ से किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रोफेसर सगीर अफ़राहीम (एएमयू)ने की। कार्यक्रम में अतिथि के रूप में प्रोफेसर कौसर मज़हरी (पूर्व अध्यक्ष, उर्दू विभाग, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली), प्रोफेसर आरिफ़ा बुशरा (अध्यक्ष, उर्दू विभाग, कश्मीर विश्वविद्यालय) तथा असलम परवेज़ (मुंबई) ने ऑनलाइन सहभागिता की। लखनऊ से एवसाक की अध्यक्ष प्रोफेसर रेशमा परवीन भी कार्यक्रम में उपस्थित रहीं। स्वागत एवं परिचय वक्तव्य फ़रहत अख़्तर ने दिया। कार्यक्रम का संचालन उर्दू विभाग के शोधार्थी शाह-ए-ज़माँ ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. इरशाद स्यानवी ने प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम का परिचय देते हुए प्रोफेसर असलम जमशेदपुरी ने कहा कि रैवती सरन शर्मा नाटक लेखन के क्षेत्र में एक बड़ा नाम हैं। हबीब तनवीर और शमीम हनफ़ी ने रेडियो नाटक के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। रेडियो के लिए नाटक लिखना आसान कार्य नहीं है। केवल आवाज़ के माध्यम से किसी कहानी या नाटक को प्रस्तुत करना बहुत कठिन होता है। उन्होंने कहा कि शमीम हनफ़ी, आरिफ़ नक़वी, कृष्ण चंदर, मंटो आदि ने रेडियो के लिए नाटक लिखे हैं। शमीम हनफ़ी के नाटकों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। नाटक के क्षेत्र में शमीम हनफ़ी ने जो महत्वपूर्ण कार्य किया है, उसका उचित मूल्यांकन आवश्यक है।
प्रोफेसर कौसर मज़हरी ने कहा कि प्रोफेसर शमीम हनफ़ी का साहित्यिक दायरा बहुत व्यापक है। उनके नाटक-संग्रह ‘ज़िंदगी की तरफ़’ और ‘मिट्टी का बुलावा’ आदि ने शमीम हनफ़ी को काफी लोकप्रिय बनाया। हमारे विभाग में भी शमीम हनफ़ी पर दो शोधार्थी शोध कर रहे हैं और आपके यहाँ भी इस विषय पर कार्य हो रहा है। इससे स्पष्ट है कि शमीम हनफ़ी ने आलोचना और शोध के क्षेत्र के साथ-साथ नाटक लेखन के क्षेत्र में भी सराहनीय सेवाएँ दी हैं।
प्रोफेसर आरिफ़ा बुशरा ने कहा कि शमीम हनफ़ी ने शोध और आलोचना के क्षेत्र में अनेक पुस्तकें लिखीं और उन्हें अनेक सम्मान भी प्राप्त हुए। यदि उनके नाटकों की बात करें तो उनमें मानसिक द्वंद्व, भाषा की सुंदरता और सांस्कृतिक समस्याओं को बहुत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है। उनके नाटकों में जीवन के अनेक नए अनुभव दिखाई देते हैं। उन्होंने बताया कि ‘मिट्टी का बुलावा’ में छह नाटक शामिल हैं। इस संग्रह का श्रेष्ठ नाटक ‘मिट्टी का बुलावा’ ही है। ‘मुझे घर याद आता है’ वर्ष 1988 में प्रकाशित हुआ। शमीम हनफ़ी के नाटकों में ज़मींदारी व्यवस्था, तहज़ीब एवं संस्कृति तथा अतीत और वर्तमान का संघर्ष स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
असलम परवेज़ ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि शमीम हनफ़ी ने अधिकांशतः रेडियो नाटक लिखे हैं और रेडियो नाटक को ‘अंधों का रंगमंच’ भी कहा जाता है। नाटकों में जो दृश्यात्मकता होती है, वह दर्शकों को अधिक प्रभावित करती है। शमीम हनफ़ी के रेडियो नाटकों में ज्ञान और साहित्य की गहरी अभिव्यक्ति दिखाई देती है।उन्होंने कहा कि शमीम हनफ़ी के रेडियो नाटकों को थोड़े परिवर्तन के साथ मंच पर भी प्रस्तुत किया जा सकता है। उनके अधिकांश पात्र जीवंत और वास्तविक लगते हैं। सामाजिक और राजनीतिक जीवन का बिखराव उनके नाटकों की प्रमुख विशेषता है। उनके रेडियो नाटकों में विभिन्न प्रकार के पात्र, सुंदर संवाद और शब्दों का अर्थपूर्ण प्रयोग देखने को मिलता है। उनके अधिकांश नाटकों में नाटकीय ग़ज़लियत भी प्रभावशाली रूप से मौजूद है। शमीम हनफ़ी ने अपने नाटकों में काफी हद तक समाज की वास्तविकता को प्रस्तुत किया है।
प्रोफेसर रेशमा परवीन ने कहा कि आज का विषय बहुत महत्वपूर्ण है। आज हमें शमीम हनफ़ी के नाटकों के बारे में जानने का अवसर मिला। मैंने आज के कार्यक्रम से काफी लाभ प्राप्त किया है। हम कभी-कभी यह सोचने और समझने का प्रयास करते हैं कि मंचीय नाटक और रेडियो नाटक में क्या अंतर होता है। आज के कार्यक्रम ने इस विषय के अनेक नए पहलुओं पर प्रकाश डाला है। कार्यक्रम से डॉ. आसिफ़ अली, डॉ. शादाब अलीम, डॉ. अलका वशिष्ठ, सैयदा मरियम इलाही, मुहम्मद शमशाद सहित अन्य छात्र-छात्राएँ भी जुड़े रहे।

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