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Tuesday, September 29, 2026

मिसिंग द मिसहेप्स: भारत में स्वास्थ्य जांच का बढ़ता चलन, लेकिन क्या दिल से जुड़े खतरों की पहचान के लिए हम सही जांच कर रहे हैं?

 


नित्य संदेश ब्यूरो

नई दिल्ली। भारत में स्वास्थ्य जांच को लेकर लोगों की सोच तेजी से बदल रही है। अब जांच केवल बीमारी के लक्षण दिखाई देने तक सीमित नहीं है। लोग पहले से अपनी सेहत के बारे में जानने और संभावित जोखिमों को पहचानने के लिए जांच करा रहे हैं। रेडक्लिफ लैब्स में होने वाली लगभग हर तीन में से दो जांचें प्रिवेंटिव यानी बचाव और समय रहते जोखिमों की पहचान के उद्देश्य से कराई जाती हैं। लेकिन जब बात दिल की सेहत की हो, तो एक अहम सवाल सामने आता है, क्या हम सिर्फ ज्यादा जांच करा रहे हैं, या उन जोखिमों की पहचान के लिए सही जांच भी करा रहे हैं जो दिल की बीमारी का कारण बन सकते हैं?


रेडक्लिफ लैब्स के राष्ट्रीय आंकड़ों के अनुसार, सबसे अधिक कराई जाने वाली पांच जांचों में सीबीसी, लिपिड प्रोफाइल, किडनी फंक्शन टेस्ट (केएफटी), लिवर फंक्शन टेस्ट (एलएफटी) और एचबीए1सी शामिल हैं। ये जांचें शरीर की सामान्य स्थिति और कई महत्वपूर्ण स्वास्थ्य संकेतकों की जानकारी देती हैं। हालांकि, सामान्य स्वास्थ्य जांच से दिल की बीमारी के जोखिम की पूरी तस्वीर हमेशा सामने नहीं आती। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, बढ़ा हुआ रक्तचाप, रक्त में ग्लूकोज़ और वसा का बढ़ा स्तर तथा अधिक वजन और मोटापा हृदय संबंधी बीमारियों के प्रमुख जोखिम कारकों में शामिल हैं। इसके अलावा असंतुलित खान-पान, शारीरिक गतिविधि की कमी और तंबाकू का सेवन भी महत्वपूर्ण जोखिम बढ़ाते हैं। इनमें से कई जोखिम ऐसे हैं जो किसी गंभीर घटना के होने से काफी पहले शरीर में मौजूद हो सकते हैं और जरूरी नहीं कि उस समय कोई स्पष्ट लक्षण भी दिखाई दें।


रेडक्लिफ लैब्स द्वारा 2.4 लाख से अधिक लोगों के छह महीने के आंकड़ों का विश्लेषण इस तस्वीर को और स्पष्ट करता है। विश्लेषण में करीब हर 2 में से 1 व्यक्ति में कोलेस्ट्रॉल, एलडीएल, एचडीएल, ट्राइग्लिसराइड्स, एचएस-सीआरपी, एनटी-प्रोबीएनपी और एच एस-ट्रोपोनिन आई जैसे हृदय स्वास्थ्य से जुड़े प्रमुख संकेतकों में असामान्य परिणाम पाए गए। 26 वर्ष से अधिक उम्र के पुरुषों में 48 प्रतिशत के परिणाम असामान्य पाए गए, जबकि 40 वर्ष से अधिक उम्र के पुरुषों में यह आंकड़ा करीब 52 प्रतिशत रहा। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि ये आंकड़े किसी व्यक्ति में हृदय रोग होने की पुष्टि नहीं करते। ये केवल जांच के दौरान सामने आए असामान्य परिणामों को दर्शाते हैं। फिर भी, ये इस बात की ओर ध्यान दिलाते हैं कि सिर्फ सामान्य स्वास्थ्य जांच या बीमारी के लक्षणों के आधार पर दिल की सेहत का पूरा आकलन करना पर्याप्त नहीं हो सकता।



रेडक्लिफ लैब्स की डायरेक्टर - लैब ऑपरेशंस, डॉ. सोनल सक्सेना, ने कहा, कोलेस्ट्रॉल की रिपोर्ट सामान्य आने का मतलब यह जरूरी नहीं है कि व्यक्ति के दिल से जुड़े सभी जोखिम खत्म हो गए हैं। हृदय स्वास्थ्य कई अलग-अलग कारकों पर निर्भर करता है। जिन लोगों में हृदय रोग से जुड़े जोखिम मौजूद हैं, उनके लिए सामान्य लिपिड प्रोफाइल से आगे जाकर कुछ अन्य संकेतकों को देखना उपयोगी हो सकता है। एलपी(ए), एपीओबी और एचएस -सीआरपी जैसे संकेतक कुछ लोगों में जोखिम को बेहतर ढंग से समझने के लिए अतिरिक्त जानकारी दे सकते हैं। हालांकि, इसका उद्देश्य हर व्यक्ति के लिए अधिक से अधिक जांच कराना नहीं, बल्कि व्यक्ति के जोखिम के अनुसार सही जांच का चुनाव करना होना चाहिए।


लिपोप्रोटीन (ए), यानी एलपी(ए), एक ऐसा संकेतक है जिस पर आनुवंशिक प्रभाव काफी अधिक होता है। इसका स्तर बढ़ा होने पर एथेरोस्क्लेरोटिक कार्डियोवैस्कुलर बीमारी, जिसमें हार्ट अटैक और स्ट्रोक शामिल हैं, का जोखिम बढ़ सकता है। यह जोखिम तब भी मौजूद हो सकता है, जब सामान्य एलडीएल कोलेस्ट्रॉल बहुत अधिक न हो। 2026 एसीसी/एएचए डिस्लिपिडेमिया गाइडलाइन में एलपी(ए) की जांच कम से कम एक बार कराने की सिफारिश की गई है। गाइडलाइन के अनुसार 125 एनएमओएल/एल (50 मिलीग्राम/डीएल) या उससे अधिक का एलपी(ए) स्तर जोखिम बढ़ाने वाला कारक माना जाता है। वहीं 250 एनएमओएल/एल (100 मिलीग्राम/डीएल) या उससे अधिक के स्तर कम से कम दोगुने अनुमानित हृदय संबंधी जोखिम से जुड़े हैं।


इसी तरह, एपीओबी शरीर में मौजूद उन कणों की संख्या के बारे में जानकारी देता है जो धमनियों में वसा जमा होने से जुड़े होते हैं। बढ़े हुए ट्राइग्लिसराइड्स या मधुमेह वाले लोगों में यह जोखिम को बेहतर ढंग से समझने में मदद कर सकता है। एचएस-सीआरपी शरीर में सूजन की स्थिति के बारे में अतिरिक्त जानकारी दे सकता है। वहीं एच एस-ट्रोपोनिन आई और एनटी-प्रोबीएनपी जैसे संकेतकों का इस्तेमाल विशेष चिकित्सकीय परिस्थितियों में किया जाता है। ये हृदय की मांसपेशियों में हुई क्षति या हृदय पर पड़ने वाले दबाव का आकलन करने में मदद कर सकते हैं। इसलिए जरूरत केवल अधिक जांच कराने की नहीं है, बल्कि व्यक्ति के स्वास्थ्य और जोखिम को समझकर यह तय करने की है कि उसके लिए कौन-सी जांच वास्तव में उपयोगी है।


रेडक्लिफ लैब्स के फाउंडर एवं सीईओ, आदित्य कंडोई, ने कहा, हम जानते हैं कि चुनौती केवल स्वास्थ्य जोखिमों की पहचान करने तक सीमित नहीं है। असली जरूरत लोगों को उन जोखिमों पर कार्रवाई करने में मदद करने की है। इसी सोच के साथ हमने हर जांच के साथ 4 गुना मूल्य की शुरुआत की है। हमारा मानना है कि डायग्नोस्टिक जांच का काम केवल एक रिपोर्ट देना नहीं होना चाहिए। लोगों को यह भी समझना चाहिए कि रिपोर्ट में सामने आए परिणाम उनके स्वास्थ्य के लिए क्या मायने रखते हैं और उन्हें आगे क्या कदम उठाना चाहिए। व्यक्तिगत खान-पान और स्वास्थ्य संबंधी सहायता के जरिए हमारा प्रयास लोगों को अपने जोखिम को समझने से आगे बढ़कर अपनी सेहत के लिए जरूरी बदलाव करने में मदद करना है। किसी समस्या की पहचान तभी सार्थक है, जब उसके बाद उस पर कार्रवाई भी हो।


"मिसिंग द मिसहेप्स" अभियान के जरिए रेडक्लिफ लैब्स इस वर्ल्ड हार्ट डे पर लोगों का ध्यान केवल जांच कराने से आगे बढ़कर अपने हृदय संबंधी जोखिमों को समझने, जांच के परिणामों का सही अर्थ जानने और समय रहते जरूरी कदम उठाने की ओर आकर्षित कर रहा है।


आखिरकार, बचाव केवल जांच कराने से शुरू नहीं होता। यह तब शुरू होता है जब हम अपने जोखिमों को समझते हैं, अपनी रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों का सही मतलब जानते हैं और किसी संभावित चेतावनी को गंभीर स्वास्थ्य समस्या बनने से पहले उस पर ध्यान देते हैं।

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