नित्य संदेश
आईने के सामने खड़े होकर हम अपने चेहरे को तो रोज़ देखते हैं, लेकिन क्या कभी अपने मन को देखा है?
कभी-कभी हम मुस्कुरा तो रहे होते हैं, लेकिन मन खुश नहीं होता। किसी को बधाई तो दे रहे होते हैं, लेकिन भीतर कहीं तुलना चल रही होती है।
किसी से कहते हैं, “मैं बिल्कुल ठीक हूं”, जबकि मन के भीतर बहुत कुछ चल रहा होता है। यही वह जगह है जहां पर्युषण का तीसरा दिन हमें रोककर अपने भीतर देखने को कहता है।
दिगंबर जैन परंपरा में तीसरे दिन ‘उत्तम आर्जव धर्म’ का चिंतन किया जाता है। आर्जव का अर्थ है—सरलता, निष्कपटता और मन, वचन तथा कर्म में एकरूपता। यानी जैसा हम भीतर से हैं, वैसा ही हमारा व्यवहार भी हो।
आज की जिंदगी में हम अक्सर अपनी एक ‘दिखने वाली’ और एक ‘वास्तविक’ जिंदगी जीते हैं। बाहर सब अच्छा दिखाना आसान है, लेकिन अपने मन के सामने ईमानदार होना कठिन। किसी परिचित की सफलता पर हम कहते हैं, “बहुत खुशी हुई”, लेकिन मन में सवाल उठता है—“इसे ही क्यों?” किसी से नाराज हैं, फिर भी मुस्कुराकर बात करते हैं और बाद में उसकी शिकायत करते हैं। घर में कहते हैं, “तुम्हारी बात बिल्कुल सही है”, लेकिन भीतर से उसे स्वीकार नहीं करते। ये छोटी-छोटी स्थितियां हमें अपने भीतर झांकने का अवसर देती हैं।
उत्तम आर्जव का अर्थ यह नहीं कि मन में जो आए, वही बिना सोचे बोल दिया जाए। सत्य के साथ संवेदनशीलता भी जरूरी है। यदि किसी की बात बुरी लगी है, तो पीठ पीछे चर्चा करने के बजाय उचित समय पर प्रेम और सम्मान से अपनी बात कहना अधिक सरल और सच्चा व्यवहार है।घर में इसका सुंदर उदाहरण देखा जा सकता है। किसी अपने से नाराज हैं तो कई दिनों तक चुप रहना, बात न करना और यह उम्मीद करना कि सामने वाला खुद समझ जाएगा—यह मन को और भारी करता है। इसके बजाय एक सरल संवाद—“आपकी इस बात से मुझे दुख हुआ”—कई गलतफहमियों को वहीं समाप्त कर सकता है।
उत्तम आर्जव हमें दूसरों के सामने अच्छा दिखने से पहले अपने सामने सच्चा होने की प्रेरणा देता है। रात सोने से पहले खुद से सिर्फ तीन सवाल पूछिए—क्या आज मैंने कुछ ऐसा कहा जो मैं वास्तव में नहीं मानता था? क्या मैंने किसी भावना को छिपाकर केवल दिखावा किया? क्या मेरे मन, वचन और व्यवहार में कहीं अंतर था? इन सवालों के जवाब किसी और को नहीं देने हैं। केवल स्वयं को देने हैं क्योंकि आत्मशुद्धि की शुरुआत दूसरों की कमियां देखने से नहीं, अपनी सच्चाई स्वीकार करने से होती है और उत्तम आर्जव का सबसे खूबसूरत अर्थ यही है—
चेहरे पर वही मुस्कान हो जो मन में हो,
वाणी में वही भाव हो जो हृदय में हो,
और कर्म वही कहें जो हम वास्तव में हैं।
दुनिया के सामने अच्छा दिखना आसान है,
लेकिन अपने मन के सामने सच्चा रहना—यही उत्तम आर्जव है।
डाॅ. प्रगति जैन


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