नित्य संदेश। विश्व राजनीति में शक्ति-संतुलन तेजी से बदल रहा है। शीतयुद्ध के दौर में दुनिया अमेरिका और सोवियत संघ की प्रतिद्वंद्विता के बीच विभाजित थी। सोवियत संघ के विघटन के बाद लगभग तीन दशकों तक अमेरिकी प्रभाव वैश्विक राजनीति पर हावी रहा, लेकिन अब एकध्रुवीय व्यवस्था भी पीछे छूटती दिखाई दे रही है। चीन का आर्थिक और सामरिक उभार, भारत की बढ़ती वैश्विक शक्ति, रूस और पश्चिम के बीच गहराता तनाव, पश्चिम एशिया की अस्थिरता तथा व्यापार और प्रौद्योगिकी में बढ़ती प्रतिस्पर्धा नई बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को आकार दे रही है। ऐसे समय में 12–13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाला 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन महज कूटनीतिक आयोजन नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में उभरती अर्थव्यवस्थाओं की सामूहिक भूमिका और भारत के नेतृत्व की निर्णायक परीक्षा भी है।
ब्रिक्स की शुरुआत 2006 में ब्राजील, रूस, भारत और चीन के साथ हुई थी। दक्षिण अफ्रीका के जुड़ने के बाद इसका विस्तार हुआ और अब मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात तथा इंडोनेशिया जैसे देश भी इसके सदस्य हैं। इस विस्तार ने ब्रिक्स को एक प्रभावशाली आर्थिक और भू-राजनीतिक मंच बना दिया है। वर्ष 2026 में इसकी स्थापना के 20 वर्ष पूरे हो रहे हैं। ऐसे समय में नई दिल्ली में होने वाला 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन विशेष महत्व रखता है। भारत की अध्यक्षता में यह सम्मेलन वैश्विक दक्षिण की आवाज को मजबूती देने, व्यापार-वित्तीय व्यवस्था में सुधार, तकनीकी सहयोग और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को नई दिशा देने का महत्वपूर्ण अवसर है। सम्मेलन की सफलता भारत की बढ़ती कूटनीतिक नेतृत्व क्षमता को भी रेखांकित करेगी। ब्रिक्स की शक्ति केवल सदस्य देशों की संख्या या अर्थव्यवस्था से तय नहीं होती। भारत-चीन रणनीतिक प्रतिस्पर्धा, रूस-पश्चिम तनाव और पश्चिम एशिया के संघर्ष इसके भीतर मतभेद पैदा करते हैं। ऐसे में सबसे बड़ी चुनौती साझा हितों का न्यूनतम आधार विकसित कर ब्रिक्स की सामूहिक प्रभावशीलता को मजबूत करना है। हालांकि, यह चुनौती भारत के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर भी है। भारत ब्रिक्स को किसी पश्चिम-विरोधी गठबंधन के बजाय बहुपक्षीय सहयोग के व्यावहारिक मंच के रूप में देखता है। अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी, रूस के साथ रक्षा और ऊर्जा संबंध, यूरोप-जापान के साथ आर्थिक एवं तकनीकी सहयोग तथा पश्चिम एशिया के देशों के साथ बढ़ते व्यापारिक और सामरिक संबंध भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को दर्शाते हैं। ब्रिक्स, क्वाड, एससीओ और जी-20 जैसे मंचों में भारत की सक्रियता इसी संतुलित दृष्टिकोण का हिस्सा है।
भारत के लिए ब्रिक्स का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह वैश्विक दक्षिण की आवाज को मजबूत करने के साथ विभिन्न शक्ति-केंद्रों के बीच संवाद का अवसर देता है। हालांकि भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि ब्रिक्स केवल कूटनीतिक मंच बनकर न रह जाए। व्यापार, निवेश, ऊर्जा सुरक्षा, आपूर्ति शृंखला, डिजिटल अर्थव्यवस्था, तकनीकी सहयोग और विकास वित्त जैसे क्षेत्रों में ठोस परिणाम भारत की प्राथमिकता होनी चाहिए। इसका वास्तविक लाभ भारतीय निर्यात, विनिर्माण, छोटे एवं मध्यम उद्योगों तथा रोजगार सृजन तक पहुंचना चाहिए। ब्रिक्स के भीतर भारत की सबसे जटिल चुनौती चीन है। दोनों देश एक ओर आर्थिक और बहुपक्षीय मंचों पर साझेदार हैं, तो दूसरी ओर सीमा विवाद, व्यापार असंतुलन, तकनीकी निर्भरता और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के कारण एक-दूसरे के प्रमुख प्रतिस्पर्धी भी हैं। ऐसी परिस्थितियों में भारत के लिए चीन के साथ संवाद बनाए रखना और अपने राष्ट्रीय हितों की दृढ़ता से रक्षा करना, दोनों समान रूप से आवश्यक हैं। भारत को चीन के साथ आर्थिक सहयोग के अवसरों का व्यावहारिक उपयोग करते हुए घरेलू विनिर्माण, अनुसंधान, तकनीकी क्षमता और विश्वसनीय आपूर्ति शृंखलाओं को मजबूत करना होगा।
ब्रिक्स के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या वह अपनी सामूहिक आर्थिक शक्ति को वास्तविक आर्थिक प्रभाव में बदल सकता है। सदस्य देशों के बीच व्यापार बढ़ाना, स्थानीय मुद्राओं में लेन-देन की संभावनाएं तलाशना, व्यापार वित्त को आसान बनाना, नई आपूर्ति शृंखलाएं विकसित करना और न्यू डेवलपमेंट बैंक की भूमिका मजबूत करना इसके महत्वपूर्ण रास्ते हैं। हालांकि साझा मुद्रा का विचार आकर्षक है, लेकिन अलग-अलग आर्थिक संरचनाओं, मौद्रिक नीतियों और वित्तीय व्यवस्थाओं के कारण यह आसान नहीं होगा। इसलिए भारत को घोषणाओं के बजाय व्यावहारिक और चरणबद्ध आर्थिक सहयोग पर जोर देना चाहिए। ब्रिक्स की सबसे बड़ी राजनीतिक संभावना वैश्विक दक्षिण में है। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के विकासशील देशों को वैश्विक संस्थाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलने की शिकायत लंबे समय से रही है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं में विकासशील देशों की भागीदारी बढ़ाने की मांग इसी असंतुलन से जुड़ी है। जी-20 की अध्यक्षता के दौरान अफ्रीकी संघ को स्थायी सदस्य बनाने में भारत की भूमिका ने दिखाया कि वह वैश्विक दक्षिण को केवल राजनीतिक नारे के रूप में नहीं, बल्कि वैश्विक शासन के एजेंडे के रूप में देखता है।
हालांकि, वैश्विक दक्षिण का नेतृत्व केवल पश्चिम की आलोचना से संभव नहीं है। इसकी वास्तविक कसौटी यह होगी कि ब्रिक्स विकासशील देशों को सस्ता विकास वित्त, तकनीकी सहयोग, खाद्य एवं ऊर्जा सुरक्षा तथा नए बाजारों तक पहुंच। भारत के हित में ब्रिक्स को पश्चिम-विरोधी गुट बनने से बचाना है। उसे चीन के साथ जहां सहयोग संभव हो, वहां सहयोग, जहां प्रतिस्पर्धा आवश्यक हो, वहां प्रतिस्पर्धा और राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में दृढ़ता अपनानी होगी। अमेरिका, यूरोप, रूस, जापान, खाड़ी देशों और वैश्विक दक्षिण के साथ समानांतर संबंधों को आगे बढ़ाना ही भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की आधारशिला है।
नई दिल्ली में होने वाला 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन भारत के लिए केवल मेजबानी नहीं, बल्कि नेतृत्व की परीक्षा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने वैश्विक दक्षिण की आकांक्षाओं को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रमुखता देने और विभिन्न शक्ति-केंद्रों के बीच संतुलित संवाद की नीति को आगे बढ़ाया है। इसकी सफलता घोषणाओं से नहीं, बल्कि भारतीय उद्योग व निर्यात के नए अवसर, ऊर्जा एवं आपूर्ति सुरक्षा, विकास और वैश्विक दक्षिण की प्रभावी भागीदारी जैसे ठोस परिणामों से मापी जानी चाहिए। यदि भारत आर्थिक सहयोग, संस्थागत सुधार और व्यावहारिक कूटनीति के माध्यम से वैश्विक दक्षिण की आवाज को मजबूत कर सका, तो नई दिल्ली सम्मेलन प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत के बढ़ते वैश्विक प्रभाव की ठोस घोषणा बन सकता है।


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