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Monday, August 3, 2026

बचपन वाली दोस्ती —रविन्द्र तंवर "सूर्योदय"

नित्य संदेश

बचपन वाली दोस्ती


फटी तकदीर के चिथड़े सुई कोई सिलती नहीं,

वो बचपन वाली दोस्ती अब मुझे मिलती नहीं।


ना समझते थे बात धर्म-मजहब की, 

ना जाति ना रंग का भेद पता था।


मासूम बचपन की बगिया में,

सच्ची दोस्ती का फूल खिलता था।


गुस्सा आता था शिक्षक पर,

जब अपना दोस्त पीटता था।


कभी उसे चिड़ा कर हस्ते थे,

कभी रोता देख दिल गुमसुम होता था।


तीन चवन्नी को मिला कर,

चार दोस्तो का खर्च निकलता था।


नहीं होती थी मतलब की यारी,

जहां मिले दिल वो ही दोस्त बनता था।


झगड़ा हो जाने पर दोस्ती न तोड़ा करते थे,

भूल कर दूसरे दिन फिर रिश्ता जोड़ा करते थे।


सोचता है बैठ "रवि" वो बाते कितनी सच्ची थी,

उम्र चाहे थी कच्ची, दोस्ती मगर पक्की थी।



रविन्द्र तंवर "सूर्योदय"

बड़वाह (म. प्र.)

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