नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। शास्त्रीनगर स्थित निज निवास पर चल रही सामवेद की नवमी कथा के चौथे दिन कथाव्यास प्रो.
पूनम लखनपाल ने प्रो. सुधाकराचार्य त्रिपाठी की प्रेरणा से सामवेद के अष्टम प्रपाठक
के प्रथमार्धक की कथा सुनाई। कथा का विषय 12 आदित्यों में से त्वष्टा और विष्णु से
सम्बद्ध दिनचर्या रहा। कथा के देवता अग्नि, इन्द्र, विष्णु, वायु और सोम रहे।
डॉ. पूनम ने बताया कि प्रातः 9:00 से 10:30 बजे तक त्वष्टा और 10:30 से 12:00 बजे
तक विष्णु आदित्य का परिचय तथा उनके गणों - ऋषि, यक्ष, गन्धर्व, नाग, राक्षस और अप्सरा
के विषय में विस्तार से बताया गया। उन्होंने कहा कि त्वष्टा अग्नि के देवता हैं। पुराणों
में उन्हें त्रिशिरा और संज्ञा का पिता कहा गया है। उन्होंने संज्ञा के पति सूर्य के
तेज को शाण पर घिस कर कम किया था। वे ही देवताओं के शिल्पी विश्वकर्मा हैं। वेदों में
विष्णु को इन्द्र का छोटा भाई कहा गया है। विष्णु का अर्थ है - प्रवेश करने वाला, व्याप्त
करने वाला। पुराणों के अनुसार विष्णु संसार का पालन-पोषण करते हैं। डॉ. पूनम ने प्रतीकों,
लौकिक एवं व्यावहारिक उदाहरणों के माध्यम से सामवेद के मंत्रों द्वारा दैनिक जीवन में
आदित्य के कुतप काल - प्रातः 9 से 12 बजे के अंतराल में की जाने वाली दिनचर्या को समझाया।

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