नित्य संदेश
15 अगस्त 2026 को भारत ने अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया। यह दिन केवल एक तारीख नहीं, बल्कि उन अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग और संघर्ष की याद दिलाता है जिनकी बदौलत आज हम आजाद हवा में सांस ले रहे हैं। अंग्रेजों के शासनकाल में जब भारत मां के सपूत 'वंदे मातरम' का जयघोष करते थे, तो ब्रिटिश हुकूमत तिलमिला उठती थी।
विडंबना देखिए कि आजादी के 80 साल बाद, जब पूरे 'वंदे मातरम' को राष्ट्रीय नियम का सम्मान मिला, तो इस सम्मान पर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व का तरीका बेहद निराशाजनक रहा। लाल किले पर ध्वजा रोहण में नहीं जाना और राष्ट्रगीत का इस तरह अपमान करना कांग्रेस का खुद के वोट बैंक को खुश करने का पेतरा है। वीडियो माध्यम से सबने देखा कि कांग्रेस मुख्यालय में आयोजित स्वतंत्रता दिवस समारोह में ध्वजारोहण के बाद जब राष्ट्रगीत गूंज रहा था, तब सावधान की मुद्रा में स्थिर रहने के बजाय राहुल गांधी, सोनिया गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे आपस में बातचीत, फुसफुसाहट, चलते-फिरते रहे और राहुल गांधी का माला की डोरी से खेलना बालकों जैसी हरकत स्पष्ट दिखाई दी। राष्ट्रगीत के तीसरे छंद पर सोनिया गांधी खड़गे से इसे रोकने को कहती दिखीं।
मीडिया के सवाल पर कांग्रेस के नेता जयराम रमेश ने तो इतनी बड़ी गलती को नहीं स्वीकारते हुए कहा कि "खड़गे जी बहुत देर से खड़े थे तो कुर्सी चाहिए थी तो सोनिया गांधी वही कह रही थी" मतलब इन लोगो की मंशा बीच वंदे मातरम में बैठने की थी? ऐसा नहीं तो क्या पांच मिनिट भी कांग्रेसियों में खड़े रहने की क्षमता नहीं? यह ओर भी कितना शर्मनाक है???
इतिहास गवाह है कि इसी 'वंदे मातरम' के बोलों ने स्वतंत्रता सेनानियों के सीने में क्रांति की अलख जगाई थी। लेकिन 1937 में मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग के दबाव में तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व ने 'वंदे मातरम' के साथ समझौता किया था। अफसोस कि 80 साल बाद भी आज नेहरू के ये वंशज अपनी ऐतिहासिक गलतियों को सुधारने के बजाय विभाजनकारी मानसिकता का परिचय दे रहे हैं।
लाल किले की प्राचीर पर माननीय मोदी जी ने ध्वजारोहण करने के बाद 75 मिनिट का भाषण दिया और राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत में पूरे अनुशासन का परिचय दिया। मोदी जी ने सही कहा कि 'दिमागी नक्सलवाद' से बचकर रहना है। ये राष्ट्रगीत का जानबूझकर अपमान कांग्रेस का दिमागी नक्सलवाद का ही उदाहरण है। अध्यक्ष खड़गे, राहुल, सोनिया राष्ट्रध्वज के साए में खड़े होकर चंद मिनटों के लिए राष्ट्रगीत का मर्यादापूर्वक सम्मान नहीं कर पाए, वे 140 करोड़ भारतीयों के नेतृत्व का दावा भी किस मुंह से कर सकते हैं?
देशभक्ति केवल भाषणों का हिस्सा नहीं होती, बल्कि आचरण और संस्कारों की कसौटी है। इसलिए ही समझदार, देशभक्त जनता कांग्रेस को इस विचारहीन और गैर-जिम्मेदाराना रवैये के कारण, इन्हें चुनावों में नकार देती है, तो अपनी हार की समीक्षा करने के बजाय ये 'ईवीएम हैक' का बहाना बनाने लगते हैं। सच तो यह है कि ईवीएम हैक नहीं होती, बल्कि इनकी अमर्यादित हरकतों और अलगाववादी सोच के कारण इनसे पूर्व से ही भरोसा उठ चुका है।
जब तक इनके राष्ट्र और उसके प्रतीकों के प्रति बुनियादी सम्मान और समर्पण की भावना आचरण में नहीं उतरेगी, तब तक कांग्रेस का सत्ता का सपना देखना निरर्थक है। 'जिन्ना की सोच' के इस आधुनिक रूप और तुष्टिकरण के रवैये को देश कभी स्वीकार नहीं करेगा। आखिर, कांग्रेस कब देश और उसके राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान करना सीखेगी? देशद्रोह की हद पार करने वाले इन गद्दारों को यह समझ लेना चाहिए कि भारत माँ की अस्मिता पर चोट करने वालों को यह राष्ट्र कभी माफ नहीं करेगा और इनकी गंदी राजनीति को हमेशा के लिए उखाड़ फेंकेगा!
— सपना सी.पी. साहू
नित्य संदेश, समाचार संपादक


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